इवीएम को लेकर बहन मायावती जी के आरोप चुनाव परिणाम के दिन ही आ गए थे । सोशल मीडिया पर भी उनकी तासीर बची हुई है। जाहिर है सबकी अपनी-अपनी समझ और प्रतिबद्धता है, इसलिये सबको अपनी बात कहने का हक़ भी है । उसी हक़ के नाते मैं भी इवीएम के पक्ष में कुछ कहना चाहता हूँ ।
चुनाव कराने के लिए आजकल इवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) का प्रयोग किया जा रहा है । पहले इसकी जगह पर बैलेट पेपर से चुनाव होता था। इस मशीन को लेकर जो सबसे बड़ी चिंता जताई जा रही है, वह यह है कि इसे हैक किया जा सकता है । यानी कि इसे अपने हित के मुताबिक सेट किया जा सकता है । कुछ इस तरह कि आप किसी भी उम्मीदवार को वोट दें, तो आपका वोट उस उम्मीदवार को न जाकर किसी विशेष उम्मीदवार को ही चला जाए । यह सेटिंग इस तरह से भी की जा सकती है कि हर ईवीएम में एक निश्चित संख्या में वोट उस विशेष पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में ही जाए । जाहिर है कि जो लोग कंप्यूटर के जानकार हैं वे इस बात से अवगत भी होंगे कि कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग के जरिये ऐसी टेम्परिंग या हैकिंग की जा सकती है ।
लेकिन यह तकनीकी आधार है जिसको सामने रखकर ईवीएम आधारित चुनाव प्रणाली को ख़ारिज नहीं किया जा सकता । मैंने अपनी पिछली पोस्ट मे लिखा था कि इसी ईवीएम के द्वारा हुए चुनाव में देश में अलग-अलग पार्टियों ने विजय हासिल की है, अपनी सरकारें बनायीं हैं । इसी ईवीएम के सहारे इन चुनावो में भी तीन राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है ।
इधर के तीन दशकों में भारत की जिन कुछ स्वायत्त संस्थाओं ने सबसे बेहतर काम किया है, उनमे चुनाव आयोग का नाम सबसे ऊपर है । न्यायपालिका के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए मैं कहना चाहूंगा कि इधर के दौर में चुनाव आयोग का प्रदर्शन उससे भी अधिक स्वतन्त्र और निष्पक्ष रहा है । न सिर्फ रहा है, बल्कि वह दिखाई भी देता है । यहाँ बात सिर्फ टी एन शेषन की नहीं हो रही है, वरन उनके उत्तराधिकारियों ने भी कम से कम इस आयोग की गरिमा को बखूबी बढ़ाया है, ऊंचा किया है ।
चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने वाले कर्मचारी और अधिकारी जानते हैं कि किस प्रकार से चुनाव आयोग यह प्रयास करता है कि उसकी पूरी चुनावी प्रक्रिया स्वतन्त्र और निष्पक्ष हो ।
चुनाव प्रक्रिया में लायी जाने वाली इस इवीएम मशीन के दो हिस्से होते हैं । एक कंट्रोल यूनिट और दूसरी बैलेट यूनिट । जब आप और हम वोट करने के लिए जाते हैं तो बैलेट यूनिट के सहारे ही वोट करते हैं । उसमें सभी प्रत्याशियों की सूची होती है, जिनके नाम और चुनाव चिन्ह वहां दर्ज होते हैं । अपने चयनित प्रत्याशी के सामने का बटन दबाकर हम अपना मत डालते हैं । कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है, जहाँ से वह बटन दबाकर आदेश देता है, तब ही बैलेट यूनिट वोट के लिए तैयार होती है । वोट बैलेट यूनिट में पड़ता है, लेकिन कंट्रोल यूनिट में दर्ज होता है । इसी कंट्रोल यूनिट से मतगड़ना की जाती है ।
जब कंट्रोल और बैलेट यूनिट को मतदान के लिए तैयार किया जाता है तो उसकी निगरानी वहां के जिलाधिकारी और बाहर के राज्य से आये आईएस कैडर के एक पर्यवेक्षक के अधीन होता है । वे दोनों लोग यह मिलकर सुनिश्चित करते है कि चुनाव में प्रयुक्त होने वाली ईवीएम मशीन सही काम कर रही हैं । यहाँ यह ध्यान रखना जरुरी है कि जैसे ही चुनाव आयोग पूरी प्रक्रिया की घोषणा करता है, उसी समय आचार संहिता लागू हो जाती है । इस आचार संहिता के लागू होने का एक मतलब यह भी होता है कि उस प्रदेश के सभी जिलाधिकारी सीधे-सीधे चुनाव आयोग के अधीन काम करने लगते हैं । चुनाव आयोग को यदि यह शिकायत मिलती है कि फला जिले के जिलाधिकारी या पुलिस अधीक्षक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, या उनका किसी तरफ झुकाव दिखाई दे रहा है, तो आयोग तुरंत ही उनको वहां से हटाकर दूसरा जिलाधिकारी औऱ पुलिस अधीक्षक नियुक्त कर देता है । उत्तरप्रदेश के इन चुनावों में भी आयोग ने ऐसे कई लोगों को उनके पदों से हटाया था और उनकी जगह पर नए अधिकारियो की नियुक्ति की थी ।
तो प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी के अतिरिक्त एक और आईएस कैडर का पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाता है जो अन्य राज्य से प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाता है । जैसे कि उत्तर प्रदेश में बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों के पर्यवेक्षक आये हुए थे । यह सब इसलिये किया जाता है कि उस राज्य की मशीनरी किसी प्रभाव में आकर एकतरफा पक्ष न ले ।
चुनाव के एक दिन पहले सभी मतदान अधिकारियो को उपस्थित होना होता है । उन्हें चुनाव सामग्री के साथ ईवीएम भी दी जाती है । और उनसे कहा जाता है कि वे अपनी अपनी मशीनों की जांच कर लें कि वे सही ढंग से काम कर रही हैं या नहीं । मसलन उस जांच में यह बात भी शामिल होती है कि आप जिसे वोट दे रहे हैं, वह वोट उसी उम्मीदवार को पड़ रहा है । चुकी ट्रेनिंग के दौरान मतदान कर्मियों को इस तरह से पाठ पढ़ाया गया रहता है कि वे खुद ही तत्पर रहते हैं कि उनकी मशीन ठीक से काम करे । मतदान के समय धोखा न दे ।
किसी भी आरोप से बचने के लिए चुनाव आयोग ने यह व्यवस्था की है कि चुनाव की सुबह सात बजे से पहले प्रत्येक राजनैतिक दलों के एजेंटो के सामने एक मॉक पोल कराय जाय । उस मॉक पोल में कम से 50 वोट डाले जाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि मशीन ठीक से काम कर रही है । एजेंट यह तसल्ली करते हैं कि उन्होंने जिस प्रत्याशी को वोट दिया है, मतगड़ना के समय उसी प्रत्याशी के खाते में वोट जा रहा है । उस मॉक पोल के बाद कंट्रोल यूनिट में रिजल्ट का बटन दबाकर उन्हें दिखाया जाता है कि आपने जिस प्रत्याशी को जितना वोट दिया है, मशीन उसी अनुपात में उसे प्रदर्शित भी कर रही है । किसी भी विवाद से बचने के लिए चुनाव आयोग ने मॉक पोल को अनिवार्य बना दिया है । इस मॉक पोल को सात बजे से पहले सम्पन्न कराना होता है । उसके बाद सात बजे से वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ।
चुनाव के बाद शाम को सभी एजेंटो के सामने मशीन को बंद किया जाता है । उसे सील किया जाता है । और सबको सील के उपयोग में लायी जाने वाली पट्टी का नंबर नोट कराया जाता है, जिससे राजनैतिक दल मतगड़ना के समय उस सील का मिलान कर सकें । बाद में इन मशीनों को केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में जिला मुख्यालय पर सुरक्षित रखा जाता है ।
मतगड़ना के समय मशीनों में लगायी गयी सील को जांचा जाता है । सभी राजनैतिक दलों के अभिकर्ताओं को दिखाया जाता है और तब मतगड़ना की जाती है । मतगड़ना की इस प्रक्रिया में भी बाहर से आये पर्यवेक्षक की भूमिका भी रहती है जिससे कि स्थानीय मशीनरी कोई भेदभाव न कर सके ।
2009 के आम चुनावों में जब भाजपा की पराजय हुई थी और कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार पुनः सत्ता में आयी थी तो लालकृष्ण आडवाणी जी ने भी इन इवीएम मशीनों पर सवाल उठाया था । चुनाव में हारने वाले अन्य कुछ लोग भी समय समय पर इन मशीनो को लेकर सवाल उठाते रहे थे । कुछ समर्थकों की तरफ से भी ये सवाल आये थे ।
आयोग ने उन सवालों के मद्देनजर मतदान प्रक्रिया में और पारदर्शिता बरतने के लिए VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail ) मशीनों की नयी व्यवस्था दी है । इस व्यवस्था के अनुसार बैलेट यूनिट के साथ यह VVPAT मशीन लगायी जाती है । आप जैसे ही बैलेट यूनिट में अपने मनपसंद प्रत्यशी के पक्ष में मतदान करते हैं, उसी समय उस मशीन में उस प्रत्याशी के नाम और चुनाव चिन्ह की पर्ची उभरती है । यह पर्ची 7 सेंकेंड तक रहती है जिसे आप देखकर संतुष्ट हो सकते हैं कि आपने जिस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया है, मशीन में वोट भी उसी के पक्ष में गया है ।
उत्तर प्रदेश में इस बार चुनाव आयोग ने कुल 30 विधान सभा क्षेत्रो में इस मशीन की व्यवस्था की थी । नीचे उसकी सूची दे रहा हूँ ।
मैंने कल एक बड़े पत्रकार को एक फर्जी पोस्ट शेयर करते हुए देखा था कि उत्तर प्रदेश में 20 विधान सभाओं में यह मशीन लगी हुई थी, जिसमे 16 जगहों पर भाजपा चुनाव हार गयी है । यह बिलकुल ही फर्जी जानकारी है । गूगल के इस जमाने में इसे जांचना इतना कठिन नहीं है । चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर आप भी देख सकते हैं कि आयोग ने 30 विधान सभाओं की सूची प्रकाशित की है, जहाँ पर इन मशीनों का प्रयोग हुआ है । इन 30 विधान सभाओं में से 25 पर भाजपा की विजय हुई है । आप इसे चुनाव आयोग की वेबसाइट से जांच भी सकते हैं ।
इन सारी व्यवस्थाओं के रहते हुए मुझे यह नहीं लगता कि उत्तरप्रदेश के इन चुनावों में कोई धांधली हुई है । इतनी पारदर्शी व्यवस्था के होते हुए मशीन से किसी प्रकार की छेड़छाड़ से भी मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूँ ।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तरप्रदेश में यह चुनाव उन अधिकारियों की देखरेख में ही संपन्न हुआ है, जिन्हें अखिलेश सरकार ने नियुक्त किया था ।
इसलिये मैं तो चुनाव आयोग की साख और विश्वसनीयता पर भरोसा करता हूँ । आप चाहें तो मुझसे सहमत हो सकते है और चाहें तो असहमत भी ।