Tuesday, March 21, 2017

गोत्र व्यस्था पर आधारित महत्वपूर्ण लेख....

अभी हाल में ही “जॉली एल.एल.बी. 2” नाम की फिल्म आई थी। ये सीरीज कानूनी प्रक्रिया पर व्यंग है, तो कई कॉमेडी सीन भी फिल्म में होते ही हैं। इसके आखरी दृश्य में पुलिस एक आतंकी को पकड़ लाइ थी जो साधू होने का ढोंग कर रहा था। वैसे तो वकील के पास आसान तरीका था कि उसकी मेडिकल जांच करवा देता, उसके मुस्लिम होने की पोल खुल जाती। लेकिन वो वहीँ के वहीँ बिना लुंगी उतरवाए, ये साबित करने पर तुला था कि ये हिन्दू नहीं है।
वो परिचय हिन्दुओं वाले तरीके से पूछना शुरू करता है, गायत्री मन्त्र वगैरह पूछ लेता है और आतंकी ऐसे टेस्ट में धोखा देने में कामयाब भी हो जाता है। लेकिन नाम के बाद जब परिवार सम्बन्धी परिचय, गोत्र-मूल वगैरह पूछा जाने लगता है तो आखिर आतंकी बीच अदालत में ही सर धुन लेता है। चीखता है, या खुदा इसके आगे भी होता है ! शायद ये दृश्य देखकर आपने हंसकर टाल भी दिया होगा। हीरो के जीतने पर खुश होने की बात होती है ध्यान देने की क्या बात होगी भला ?
यहाँ गोत्र ध्यान देने की बात है। जैसा कि आम तौर पर हिन्दुओं की परम्पराओं के साथ किया जाता है वैसे ही इसे भी आडम्बर, बेवकूफी कहकर पहले तो इसका मजाक उड़ाया जाता रहा। लेकिन हिन्दुओं और उनके मक्कार बामनों ने फिर नए तरीके की मैक्ले मॉडल वाली पढ़ाई भी कर डाली और बताना शुरू कर दिया कि ये तो वैज्ञानिक रूप से भी सही है ! एक ही परिवार में होने वाली शादियों से अनुवांशिक रोगों की संभावना कई गुना बढ़ जाती है। ऐसा नहीं करना चाहिए, आधुनिक विज्ञान भी यही मानता है।
दूसरी समस्या ये हुई कि इस से जिस जाति व्यवस्था का इल्जाम हिन्दुओं पर थोपा जाता था उसकी पोल खुलने लगी। अगर हिन्दुओं में ज़ात ऊँची नीची मानी जाती और एक दुसरे में ज़ात के आधार पर शादी विवाह का परहेज होता तो शादियों में ज़ात पूछते, गोत्र क्यों पूछते हैं ज़ात के बदले ? ऊपर से ज़ात में ज़ के नीचे नुक्ता लगता था, तो ये देवनागरी लिपि का होता ही नहीं, मतलब भारत में मुश्किल से दो सौ साल से ही होगा। ऐसे मुश्किल सवाल जब आये तो हमलावरों ने फिर से हमले के तरीके को थोड़ा बदला।
ज़ात-पात की तलवार से हमले के फ़ौरन बाद नारीवाद की ढाल इस्तेमाल होती है। तो अब जब ज़ात वाली तलवार कम कामयाब होने लगी तो नारीवाद की ढाल से बचाव-हमले शुरू हुए। कहा जाने लगा कि वंश लड़कियों के नाम से चले, इसलिए गोत्र भी लड़कियों का क्यों ना आगे चले ? पुरुषों में जहाँ XY क्रोमोजोम होते हैं, वहीँ स्त्रियों में केवल XX होते हैं। इसी वजह से कलर ब्लाइंडनेस जैसी कई बीमारियाँ भी पुरुषों को ही होती हैं, जैसे गोत्र लड़कियों का नहीं होता, वैसे ही ये बीमारी लड़कियों को नहीं हो सकती।
ये Y क्रोमोजोम ही तय करने का तरीका होता था गोत्र। थोड़े सालों बाद जब व्यवस्था विकृत हो चुकी होगी, लड़कियों के गोत्र से आगे का गोत्र होगा, तब ये नहीं कहा जा सकेगा कि ये वैज्ञानिक व्यवस्था है। उस वक्त इसे छोड़ देने की जिद मचाना भी आसान होगा। एक अक्षर भी नहीं बदला जा सकता की जिद के कारण अब्राह्मिक मजहब-पंथ, इस तरह के प्रदुषण से मुक्त होते हैं। हिन्दुओं में उनकी सतत सुधार की प्रक्रिया एक गुण है, लेकिन उसे कमजोरी की तरह भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
थोड़े साल में इसका नतीजा ये होगा कि जब पूछा जाएगा कि गोत्र का वैज्ञानिक कारण क्या है ? तो हिन्दुओं के पास कोई जवाब नहीं होगा। उस स्थिति में इसे तोड़ना भी आसान होगा। जैसे संजय लीला भंसाली अपने नाम में माँ का नाम इस्तेमाल करते हैं, वैसे भी नाम को वंश में आगे ले जाया जा सकता है। इसके लिए गोत्र की सामाजिक व्यवस्था को बिना उचित वैज्ञानिक कारण दिए बदलना गलत लगता है। अपने नाम को जिन्दा रखने के निजी स्वार्थ के लिए ऐसा करना, कुछ कुछ मायावती का, सरकारी खर्चे पे, अपनी ही मूर्तियाँ लगवाने जैसा है।
बाकी नारसीसिअस नाम भी है, कहानी भी, अपने में ही उलझे होने का उदाहरण भी। आइना भी आपके पास ही होगा, पूछिए, देखिये, क्या कहता है ?

Tuesday, March 14, 2017

इवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) से छेड़छाड़ के आरोप और सच

इवीएम को लेकर बहन मायावती जी के आरोप चुनाव परिणाम के दिन ही आ गए थे । सोशल मीडिया पर भी उनकी तासीर बची हुई है। जाहिर है सबकी अपनी-अपनी समझ और प्रतिबद्धता है, इसलिये सबको अपनी बात कहने का हक़ भी है । उसी हक़ के नाते मैं भी इवीएम के पक्ष में कुछ कहना चाहता हूँ ।
चुनाव कराने के लिए आजकल इवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) का प्रयोग किया जा रहा है । पहले इसकी जगह पर बैलेट पेपर से चुनाव होता था। इस मशीन को लेकर जो सबसे बड़ी चिंता जताई जा रही है, वह यह है कि इसे हैक किया जा सकता है । यानी कि इसे अपने हित के मुताबिक सेट किया जा सकता है । कुछ इस तरह कि आप किसी भी उम्मीदवार को वोट दें, तो आपका वोट उस उम्मीदवार को न जाकर किसी विशेष उम्मीदवार को ही चला जाए । यह सेटिंग इस तरह से भी की जा सकती है कि हर ईवीएम में एक निश्चित संख्या में वोट उस विशेष पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में ही जाए । जाहिर है कि जो लोग कंप्यूटर के जानकार हैं वे इस बात से अवगत भी होंगे कि कंप्यूटर में प्रोग्रामिंग के जरिये ऐसी टेम्परिंग या हैकिंग की जा सकती है ।
लेकिन यह तकनीकी आधार है जिसको सामने रखकर ईवीएम आधारित चुनाव प्रणाली को ख़ारिज नहीं किया जा सकता । मैंने अपनी पिछली पोस्ट मे लिखा था कि इसी ईवीएम के द्वारा हुए चुनाव में देश में अलग-अलग पार्टियों ने विजय हासिल की है, अपनी सरकारें बनायीं हैं । इसी ईवीएम के सहारे इन चुनावो में भी तीन राज्यों में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है ।
इधर के तीन दशकों में भारत की जिन कुछ स्वायत्त संस्थाओं ने सबसे बेहतर काम किया है, उनमे चुनाव आयोग का नाम सबसे ऊपर है । न्यायपालिका के प्रति पूरा सम्मान रखते हुए मैं कहना चाहूंगा कि इधर के दौर में चुनाव आयोग का प्रदर्शन उससे भी अधिक स्वतन्त्र और निष्पक्ष रहा है । न सिर्फ रहा है, बल्कि वह दिखाई भी देता है । यहाँ बात सिर्फ टी एन शेषन की नहीं हो रही है, वरन उनके उत्तराधिकारियों ने भी कम से कम इस आयोग की गरिमा को बखूबी बढ़ाया है, ऊंचा किया है ।
चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने वाले कर्मचारी और अधिकारी जानते हैं कि किस प्रकार से चुनाव आयोग यह प्रयास करता है कि उसकी पूरी चुनावी प्रक्रिया स्वतन्त्र और निष्पक्ष हो ।
चुनाव प्रक्रिया में लायी जाने वाली इस इवीएम मशीन के दो हिस्से होते हैं । एक कंट्रोल यूनिट और दूसरी बैलेट यूनिट । जब आप और हम वोट करने के लिए जाते हैं तो बैलेट यूनिट के सहारे ही वोट करते हैं । उसमें सभी प्रत्याशियों की सूची होती है, जिनके नाम और चुनाव चिन्ह वहां दर्ज होते हैं । अपने चयनित प्रत्याशी के सामने का बटन दबाकर हम अपना मत डालते हैं । कंट्रोल यूनिट मतदान अधिकारी के पास होती है, जहाँ से वह बटन दबाकर आदेश देता है, तब ही बैलेट यूनिट वोट के लिए तैयार होती है । वोट बैलेट यूनिट में पड़ता है, लेकिन कंट्रोल यूनिट में दर्ज होता है । इसी कंट्रोल यूनिट से मतगड़ना की जाती है ।
जब कंट्रोल और बैलेट यूनिट को मतदान के लिए तैयार किया जाता है तो उसकी निगरानी वहां के जिलाधिकारी और बाहर के राज्य से आये आईएस कैडर के एक पर्यवेक्षक के अधीन होता है । वे दोनों लोग यह मिलकर सुनिश्चित करते है कि चुनाव में प्रयुक्त होने वाली ईवीएम मशीन सही काम कर रही हैं । यहाँ यह ध्यान रखना जरुरी है कि जैसे ही चुनाव आयोग पूरी प्रक्रिया की घोषणा करता है, उसी समय आचार संहिता लागू हो जाती है । इस आचार संहिता के लागू होने का एक मतलब यह भी होता है कि उस प्रदेश के सभी जिलाधिकारी सीधे-सीधे चुनाव आयोग के अधीन काम करने लगते हैं । चुनाव आयोग को यदि यह शिकायत मिलती है कि फला जिले के जिलाधिकारी या पुलिस अधीक्षक ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, या उनका किसी तरफ झुकाव दिखाई दे रहा है, तो आयोग तुरंत ही उनको वहां से हटाकर दूसरा जिलाधिकारी औऱ पुलिस अधीक्षक नियुक्त कर देता है । उत्तरप्रदेश के इन चुनावों में भी आयोग ने ऐसे कई लोगों को उनके पदों से हटाया था और उनकी जगह पर नए अधिकारियो की नियुक्ति की थी ।
तो प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी के अतिरिक्त एक और आईएस कैडर का पर्यवेक्षक नियुक्त किया जाता है जो अन्य राज्य से प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाता है । जैसे कि उत्तर प्रदेश में बिहार, बंगाल, मध्यप्रदेश, और जम्मू कश्मीर जैसे राज्यों के पर्यवेक्षक आये हुए थे । यह सब इसलिये किया जाता है कि उस राज्य की मशीनरी किसी प्रभाव में आकर एकतरफा पक्ष न ले ।
चुनाव के एक दिन पहले सभी मतदान अधिकारियो को उपस्थित होना होता है । उन्हें चुनाव सामग्री के साथ ईवीएम भी दी जाती है । और उनसे कहा जाता है कि वे अपनी अपनी मशीनों की जांच कर लें कि वे सही ढंग से काम कर रही हैं या नहीं । मसलन उस जांच में यह बात भी शामिल होती है कि आप जिसे वोट दे रहे हैं, वह वोट उसी उम्मीदवार को पड़ रहा है । चुकी ट्रेनिंग के दौरान मतदान कर्मियों को इस तरह से पाठ पढ़ाया गया रहता है कि वे खुद ही तत्पर रहते हैं कि उनकी मशीन ठीक से काम करे । मतदान के समय धोखा न दे ।
किसी भी आरोप से बचने के लिए चुनाव आयोग ने यह व्यवस्था की है कि चुनाव की सुबह सात बजे से पहले प्रत्येक राजनैतिक दलों के एजेंटो के सामने एक मॉक पोल कराय जाय । उस मॉक पोल में कम से 50 वोट डाले जाते हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि मशीन ठीक से काम कर रही है । एजेंट यह तसल्ली करते हैं कि उन्होंने जिस प्रत्याशी को वोट दिया है, मतगड़ना के समय उसी प्रत्याशी के खाते में वोट जा रहा है । उस मॉक पोल के बाद कंट्रोल यूनिट में रिजल्ट का बटन दबाकर उन्हें दिखाया जाता है कि आपने जिस प्रत्याशी को जितना वोट दिया है, मशीन उसी अनुपात में उसे प्रदर्शित भी कर रही है । किसी भी विवाद से बचने के लिए चुनाव आयोग ने मॉक पोल को अनिवार्य बना दिया है । इस मॉक पोल को सात बजे से पहले सम्पन्न कराना होता है । उसके बाद सात बजे से वोटिंग की प्रक्रिया शुरू हो जाती है ।
चुनाव के बाद शाम को सभी एजेंटो के सामने मशीन को बंद किया जाता है । उसे सील किया जाता है । और सबको सील के उपयोग में लायी जाने वाली पट्टी का नंबर नोट कराया जाता है, जिससे राजनैतिक दल मतगड़ना के समय उस सील का मिलान कर सकें । बाद में इन मशीनों को केंद्रीय सुरक्षा बलों की निगरानी में जिला मुख्यालय पर सुरक्षित रखा जाता है ।
मतगड़ना के समय मशीनों में लगायी गयी सील को जांचा जाता है । सभी राजनैतिक दलों के अभिकर्ताओं को दिखाया जाता है और तब मतगड़ना की जाती है । मतगड़ना की इस प्रक्रिया में भी बाहर से आये पर्यवेक्षक की भूमिका भी रहती है जिससे कि स्थानीय मशीनरी कोई भेदभाव न कर सके ।
2009 के आम चुनावों में जब भाजपा की पराजय हुई थी और कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार पुनः सत्ता में आयी थी तो लालकृष्ण आडवाणी जी ने भी इन इवीएम मशीनों पर सवाल उठाया था । चुनाव में हारने वाले अन्य कुछ लोग भी समय समय पर इन मशीनो को लेकर सवाल उठाते रहे थे । कुछ समर्थकों की तरफ से भी ये सवाल आये थे ।
आयोग ने उन सवालों के मद्देनजर मतदान प्रक्रिया में और पारदर्शिता बरतने के लिए VVPAT (Voter Verifiable Paper Audit Trail ) मशीनों की नयी व्यवस्था दी है । इस व्यवस्था के अनुसार बैलेट यूनिट के साथ यह VVPAT मशीन लगायी जाती है । आप जैसे ही बैलेट यूनिट में अपने मनपसंद प्रत्यशी के पक्ष में मतदान करते हैं, उसी समय उस मशीन में उस प्रत्याशी के नाम और चुनाव चिन्ह की पर्ची उभरती है । यह पर्ची 7 सेंकेंड तक रहती है जिसे आप देखकर संतुष्ट हो सकते हैं कि आपने जिस प्रत्याशी के पक्ष में मतदान किया है, मशीन में वोट भी उसी के पक्ष में गया है ।
उत्तर प्रदेश में इस बार चुनाव आयोग ने कुल 30 विधान सभा क्षेत्रो में इस मशीन की व्यवस्था की थी । नीचे उसकी सूची दे रहा हूँ ।
मैंने कल एक बड़े पत्रकार को एक फर्जी पोस्ट शेयर करते हुए देखा था कि उत्तर प्रदेश में 20 विधान सभाओं में यह मशीन लगी हुई थी, जिसमे 16 जगहों पर भाजपा चुनाव हार गयी है । यह बिलकुल ही फर्जी जानकारी है । गूगल के इस जमाने में इसे जांचना इतना कठिन नहीं है । चुनाव आयोग की वेबसाइट पर जाकर आप भी देख सकते हैं कि आयोग ने 30 विधान सभाओं की सूची प्रकाशित की है, जहाँ पर इन मशीनों का प्रयोग हुआ है । इन 30 विधान सभाओं में से 25 पर भाजपा की विजय हुई है । आप इसे चुनाव आयोग की वेबसाइट से जांच भी सकते हैं ।
इन सारी व्यवस्थाओं के रहते हुए मुझे यह नहीं लगता कि उत्तरप्रदेश के इन चुनावों में कोई धांधली हुई है । इतनी पारदर्शी व्यवस्था के होते हुए मशीन से किसी प्रकार की छेड़छाड़ से भी मैं सहमत नहीं हो पा रहा हूँ ।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तरप्रदेश में यह चुनाव उन अधिकारियों की देखरेख में ही संपन्न हुआ है, जिन्हें अखिलेश सरकार ने नियुक्त किया था ।
इसलिये मैं तो चुनाव आयोग की साख और विश्वसनीयता पर भरोसा करता हूँ । आप चाहें तो मुझसे सहमत हो सकते है और चाहें तो असहमत भी ।

Friday, March 10, 2017

बच्चे और सावधानी - डॉ. अव्यक्त अग्रवाल

कल फ़िर एक बच्ची आयी मेडिकल कॉलेज में। गंभीर,बेहोश एवं झटके के साथ। मस्तिष्क को बहुत नुकसान पंहुचा। जान तो हम बचा पाये वेंटीलेटर के सहारे लेकिन मस्तिष्क में पंहुचे नुकसान को शायद ही ठीक किया जा सके। हुआ जो था उसने ही यह पोस्ट लिख, लोगों को जागरूक करने का विचार आया। बच्ची एक वर्ष की है और हुआ यह कि घर के किचन में एक छोटी सी टंकी थी जिसमें बच्ची माँ को सर के बल डूबी मिली,पता नहीं कितने देर से।

हर शिशु रोग विशेषज्ञ एवं शिशु अस्पताल इस तरह के अनेक हादसे हर वर्ष देखता है। निम्न लिस्ट लिख रहा हूँ जिसे हर उस परिवार में होना चाहिए जिसमें छोटे बच्चे हों :
1. बच्चा बाथरूम में न पंहुच सके ऐसा इंतेज़ाम रखिये। जैसे दरवाज़ा बंद रखना । मैं अपने करियर में 3 बच्चे सिर्फ बाल्टी में सर उलट जाने की वज़ह से गंभीर हालत में लाये हुए देख चुका हूँ। मुझसे अनेकों चिकित्सक सैकड़ों ऐसे केसेस देखते होंगे।
2. सिक्के,मूंगफली,चने,सीताफल के बीज,नारियल के टुकड़े,कच्चे चावल,बादाम जैसी छोटी और कड़ी चीज़ें प्रतिवर्ष अनेक बच्चे अपनी स्वांस नली में फंसा लेते हैं। जिनसे मृत्यु भी हो ज़ाती है अथवा समय पर लाने पर ब्रोंकोस्कोपी नामक महंगी और रिस्की प्रक्रिया से इन foreign body को निकाला जाता है।
एक बेहद इंटरेस्टिंग केस मेरे पास आया था 2 वर्ष की बच्ची को दो माह से बहुत खांसी थी और दो बार न्यूमोनिया से कहीं भर्ती हुई थी,अस्थमा का इलाज़ भी चल रहा था।। जब मेरे पास लायी गयी तो लक्षणों के आधार पर मुझे संभावना लगी कि कुछ अटका हो सकता है स्वांस नली में। लेकिन घर के किसी भी सदस्य को नहीं पता था कि उसे कुछ भी खाते खाते अचानक खांसी शुरू हुई थी 2 माह पूर्व।
लेकिन हमने ब्रोंचोस्कोपी का निर्णय लिया और उसमें क्या मिला? नारियल का टुकड़ा। जिसे निकालने के बाद बच्ची पूर्णतः स्वस्थ हो गयी। अतः छोटे बच्चों के हाथों में इस तरह के बीज,कंचे,सिक्के नुमा चीज़ें न आने दें न ही घर में फैला कर रखें। बीज़ वाले फल अपने सामने खिलाएं और हमेशा बैठा कर। लेटे होकर कुछ भी खाने से स्वांस नली में जाने की संभावना बढ़ ज़ातीं है। (मेरा एडिट: दादी-नानी या हिन्दुत्ववादी जब पलंग पर बैठ के या लेट के खाने पर टोकते हैं, तो उतनी मूर्खता नहीं कर रहे होते हैं|)
3. केरोसिन: मिट्टी का तेल अथवा पेट्रोल बहुत से बच्चे 5 वर्ष की उम्र तक के पीकर आ जाते हैं। इन दोनों ही तेलों से बच्चों में गंभीर केमिकल निमोनिया होता है साथ ही इस गंभीर ज़हर को काटने का कोई एंटीडोट भी नहीं होता। कम तेल पिया हो तो बच जाते हैं लेकिन 50 ML से ज़्यादा मात्रा में गंभीर होने की सम्भावना एवं मृत्यु की संभावना बन ज़ातीं है।
बहुत से परिवार पेट्रोल,मिट्टी के तेल,तारपीन तेल को ज़हर नहीं मानते और यूँ ही रखे रहते हैं। बच्चों की पंहुच से इन्हें हमेशा दूर रखें। (मेरा एडिट: किरासन/मिटटी के तेल को जहर की तरह इस्तेमाल कर के आत्महत्या करने वाले दसवीं के बच्चों का हमें पता है, ये होता है |)
4. प्रति वर्ष बिना मुडेर की छत से गिरकर या बालकनी से गिरकर छोटे एवं बड़े बच्चे दोनों ही हर शहर में आते ही रहते हैं,गंभीर हेड इंजुरी के साथ। ऐसी छत का ध्यान रखिए , पैरापेट वाल ज़रूर हो और बच्चे नज़र में हों।
5. गर्म दूध,पानी,चाय से जलकर आने वाले बच्चे बहुत हैं। ध्यान रखिए।
6. सांप, कुत्ते,काटने के बहुत केस आते हैं।
7.कभी कभार करेंट लग कर गंभीर समस्या के बच्चे दिख जाते हैं। कूलर ,खुले वायर का ध्यान रखें।
8. टीवी को अपने ऊपर गिरा कर आने वाले बच्चे भी मिल जाते हैं। एक की मृत्यु भी देखी। छोटे स्टैंड पर टीवी न रखी हो जिसे बच्चे हिला सकें।
9.मोहल्लों की सड़कों पर बच्चे दौड़ते हैं और तेज़ चलती बाइक या कार के बीच आ जाते हैं।
उपरोक्त होने वाली गलतियों से बच्चों की मृत्य,परिवारों को बहुत बड़े दुःख और तकलीफों से बचाया जा सकता है। गलती हो जाने से बेहतर पहले औरों से हो चुकी गलतियों से सीखना है। जिनके छोटे बच्चे हैं वे इन पॉइंट्स को पढ़ लें,सेव कर लें।

आपका
डॉ अव्यक्त