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Friday, March 10, 2017

बच्चे और सावधानी - डॉ. अव्यक्त अग्रवाल

कल फ़िर एक बच्ची आयी मेडिकल कॉलेज में। गंभीर,बेहोश एवं झटके के साथ। मस्तिष्क को बहुत नुकसान पंहुचा। जान तो हम बचा पाये वेंटीलेटर के सहारे लेकिन मस्तिष्क में पंहुचे नुकसान को शायद ही ठीक किया जा सके। हुआ जो था उसने ही यह पोस्ट लिख, लोगों को जागरूक करने का विचार आया। बच्ची एक वर्ष की है और हुआ यह कि घर के किचन में एक छोटी सी टंकी थी जिसमें बच्ची माँ को सर के बल डूबी मिली,पता नहीं कितने देर से।

हर शिशु रोग विशेषज्ञ एवं शिशु अस्पताल इस तरह के अनेक हादसे हर वर्ष देखता है। निम्न लिस्ट लिख रहा हूँ जिसे हर उस परिवार में होना चाहिए जिसमें छोटे बच्चे हों :
1. बच्चा बाथरूम में न पंहुच सके ऐसा इंतेज़ाम रखिये। जैसे दरवाज़ा बंद रखना । मैं अपने करियर में 3 बच्चे सिर्फ बाल्टी में सर उलट जाने की वज़ह से गंभीर हालत में लाये हुए देख चुका हूँ। मुझसे अनेकों चिकित्सक सैकड़ों ऐसे केसेस देखते होंगे।
2. सिक्के,मूंगफली,चने,सीताफल के बीज,नारियल के टुकड़े,कच्चे चावल,बादाम जैसी छोटी और कड़ी चीज़ें प्रतिवर्ष अनेक बच्चे अपनी स्वांस नली में फंसा लेते हैं। जिनसे मृत्यु भी हो ज़ाती है अथवा समय पर लाने पर ब्रोंकोस्कोपी नामक महंगी और रिस्की प्रक्रिया से इन foreign body को निकाला जाता है।
एक बेहद इंटरेस्टिंग केस मेरे पास आया था 2 वर्ष की बच्ची को दो माह से बहुत खांसी थी और दो बार न्यूमोनिया से कहीं भर्ती हुई थी,अस्थमा का इलाज़ भी चल रहा था।। जब मेरे पास लायी गयी तो लक्षणों के आधार पर मुझे संभावना लगी कि कुछ अटका हो सकता है स्वांस नली में। लेकिन घर के किसी भी सदस्य को नहीं पता था कि उसे कुछ भी खाते खाते अचानक खांसी शुरू हुई थी 2 माह पूर्व।
लेकिन हमने ब्रोंचोस्कोपी का निर्णय लिया और उसमें क्या मिला? नारियल का टुकड़ा। जिसे निकालने के बाद बच्ची पूर्णतः स्वस्थ हो गयी। अतः छोटे बच्चों के हाथों में इस तरह के बीज,कंचे,सिक्के नुमा चीज़ें न आने दें न ही घर में फैला कर रखें। बीज़ वाले फल अपने सामने खिलाएं और हमेशा बैठा कर। लेटे होकर कुछ भी खाने से स्वांस नली में जाने की संभावना बढ़ ज़ातीं है। (मेरा एडिट: दादी-नानी या हिन्दुत्ववादी जब पलंग पर बैठ के या लेट के खाने पर टोकते हैं, तो उतनी मूर्खता नहीं कर रहे होते हैं|)
3. केरोसिन: मिट्टी का तेल अथवा पेट्रोल बहुत से बच्चे 5 वर्ष की उम्र तक के पीकर आ जाते हैं। इन दोनों ही तेलों से बच्चों में गंभीर केमिकल निमोनिया होता है साथ ही इस गंभीर ज़हर को काटने का कोई एंटीडोट भी नहीं होता। कम तेल पिया हो तो बच जाते हैं लेकिन 50 ML से ज़्यादा मात्रा में गंभीर होने की सम्भावना एवं मृत्यु की संभावना बन ज़ातीं है।
बहुत से परिवार पेट्रोल,मिट्टी के तेल,तारपीन तेल को ज़हर नहीं मानते और यूँ ही रखे रहते हैं। बच्चों की पंहुच से इन्हें हमेशा दूर रखें। (मेरा एडिट: किरासन/मिटटी के तेल को जहर की तरह इस्तेमाल कर के आत्महत्या करने वाले दसवीं के बच्चों का हमें पता है, ये होता है |)
4. प्रति वर्ष बिना मुडेर की छत से गिरकर या बालकनी से गिरकर छोटे एवं बड़े बच्चे दोनों ही हर शहर में आते ही रहते हैं,गंभीर हेड इंजुरी के साथ। ऐसी छत का ध्यान रखिए , पैरापेट वाल ज़रूर हो और बच्चे नज़र में हों।
5. गर्म दूध,पानी,चाय से जलकर आने वाले बच्चे बहुत हैं। ध्यान रखिए।
6. सांप, कुत्ते,काटने के बहुत केस आते हैं।
7.कभी कभार करेंट लग कर गंभीर समस्या के बच्चे दिख जाते हैं। कूलर ,खुले वायर का ध्यान रखें।
8. टीवी को अपने ऊपर गिरा कर आने वाले बच्चे भी मिल जाते हैं। एक की मृत्यु भी देखी। छोटे स्टैंड पर टीवी न रखी हो जिसे बच्चे हिला सकें।
9.मोहल्लों की सड़कों पर बच्चे दौड़ते हैं और तेज़ चलती बाइक या कार के बीच आ जाते हैं।
उपरोक्त होने वाली गलतियों से बच्चों की मृत्य,परिवारों को बहुत बड़े दुःख और तकलीफों से बचाया जा सकता है। गलती हो जाने से बेहतर पहले औरों से हो चुकी गलतियों से सीखना है। जिनके छोटे बच्चे हैं वे इन पॉइंट्स को पढ़ लें,सेव कर लें।

आपका
डॉ अव्यक्त

Friday, February 17, 2017

जनरेशन गैप एवं चाइल्ड सायकॉलॉजी - मेघा मैत्रेय


मॉल में कपड़े देख रही थी। बगल में ही एक माँ अपनी बारह-तेरह साल की बेटी के साथ शॉपिंग कर रही थी।माँ ने बेटी को एक कुरती दिखाया तो बेटी ने बड़ी बदतमीजी से पलट कर जवाब दिया,"मैं नहीं पहनूँगी, तुम ही पहन लो।" बात कहने का टोन कुछ ऐसा था कि मेरा चेहरा ना चाहते हुए भी सख्त हो गया। मुझसे नजर मिली तो झेंपते हुए आंटी हंसकर कहती है,"आजकल के बच्चे भी ना, बस अपनी मर्जी की करते हैं।" मैंने जवाब नहीं दिया, लेकिन बस दिमाग में यही आया कि मर्जी अपनी हो सकती है, पर छोटी-छोटी बातों में बदतमीजी करने का हक कहा से ला रहें हैं ये बच्चे?
हमारे देश में (infact पूरी दुनिया में) पौराणिक काल से माता-पिता का एक टाइप पाया जाता रहा है जो अनुशासन शब्द को बड़ा महत्व देता है, और इसके लिए कंटाप-घुसा,लत्तम-जूता हर प्रकार के तरीकों का उपयोग जरूरी मानता है। कोई भी child psychologist इनके तरीकों को गलत और extreme मानेगा।मैं भी सहमत हूँ। पर आप इस बात से इंकार नहीं कर सकतें की इस प्रकार के अभिभावकों की एक सफलता यह है, कि वे अस्सी साल के उम्र में जब घसीट कर बाथरूम जाना शुरू कर देते हैं, तो भी बेटे के दिमाग में उनसे पीछा छुड़ाने का ऑप्शन भूल कर भी नहीं आता।आप के घर में भी ऐसे उदाहरण हैं, जिनके लिये बाप बस बाप होता है, भले ही उनकी हड्डियों में जान और आवाज में कड़क खत्म हो चुकी हो।
इसके बाद इनके उलट बिल्कुल अलग प्रजाति आयी, जो अपने बच्चों के प्रति इतना warmth रखने लगी कि इनके ढ़ाइ किलोमीटर के रेडियस में आने वाला हर पड़ोसी का बच्चा जल कर मर जाये।इनका साफ़ कहना है, कि अगर बच्चा नियम से प्रतिदिन दो बार इनके सर पर चढ़ कर सूसू नहीं करेगा, तो ये खुद को अच्छा पैरेंट नहीं मानेंगे।
इस प्रजाति का सबसे प्रत्यक्ष असर यह है कि पहले बच्चा दोस्त से एक घूँसा खाता था, दो लगाता था, और फिर अगले दिन साथ खेलता था। पर अब चार साल के दो बच्चों कि लड़ाई कब अगले तीन सौ साल चलने वाली दो परिवारों की पुश्तैनी लड़ाई में बदल जायेगी, कहना मुश्किल है। समाज इतना टूट चूका है कि आप मुहल्ले के किसी के बच्चे को गलत करता देख प्यार से भी समझायेंगे, तो हो सकता है कि उसका पूरा परिवार दल-बल के साथ आप पर चढ़ाई कर दे (तुमने मेरे लाडले को कुछ कहने की हिम्मत कैसे की? कैसे? आखिर कैसे?)

हाल में ही जब चाइल्ड सायकॉलॉजी के एक कॉन्फ्रेंस में गयी थी तो वहाँ आयी एक वक्ता ने एक बात बोली, " हर वह माता-पिता जो अपने दो बच्चों के लिये हमेशा दो डेयरी मिल्क लाते हैं, अपने भविष्य के लिए खतरा पैदा कर रहें हैं। आज आपने उन्हें कन्डीशन किया है आपस में शेयरिंग नहीं करने के लिए, कल को वह आपके साथ भी नहीं करेगा।" 
आगे उसने कहा,"अगर वो शेयर करने के लिए तैयार नहीं हैं तो आप दोनों पति-पत्नी उस चॉकलेट को खाइये और रैपर फेंकने के लिए बच्चे को थमा दीजिये, वो भी प्यार से, बिना गाली-गलौच के।"
इस सच्चाई को जांचने के लिए ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं है, बढ़ते वृद्धाश्रम और तिरस्कृत होते माता- पिता हर तरफ दिखेंगे।

Genration gap एक प्राकृतिक समस्या हैं और communication gap थोड़ी सांस्कृतिक, लेकिन माता-पिता को बोझ मानना और अपने स्टेट्स सिम्बल के लिए खतरा देखना सिर्फ कमीनापंथी है।
English-vinglish बहुत हद तक एक जमीनी हकीकत बयाँ करती हैं। अंग्रेजियत की बयार हमारे अंदर इतनी ज्यादा आ गयी हैं, कि नेट पर सर्फिंग ना कर पाने वाली और एस्केलेटर पर लड़खड़ा कर चढ़ने वाली माँ बच्चों को अपना इमेज बिगाड़ती हुई प्रतीत होती हैं। गाँव के मेरे दोस्त जो आज IIT पहुंच गए हैं, शरमाते हैं अपने ठेठ गंवार पिता पर।

समझ नहीं आता कि मेरी पीढ़ी इस बात को समझने के लिए तैयार क्यू नहीं हैं कि पिछले सौ सालों में जितनी तेजी से दुनिया बदली हैं, संस्कृति, और लाइफस्टाइल बदला हैं, वैसा मानव इतिहास में कभी नहीं हुआ। 
आप नहीं करवा सकते विविध भारती वाली पीढ़ी से Baywatch हजम। और करवानी भी नहीं चाहिये। ये थोड़ी-बहुत बची हुई पुरानी चीजें हैं, जो हमें जड़ से जोड़े रखती हैं। उन्हें जब अपना लोग तो समझ आएगा कि वो भले ही cool ना दिखे पर खूबसूरत हैं अपनी तरह। 
बाकी अभिभावकों को थोड़ा सावधान तो रहना ही चाहिए कि आपका बच्चा बस "सफल" ही ना बन कर रह जाये। वरना पश्चिम के पास बहुत पैसे हैं, उधर वृद्धाश्रम तिन टाइम का बढ़िया खाना देगी और सरकार भत्ता। यहाँ बहन की शादी, बच्चे की पढ़ाई,माँ की तीर्थयात्रा, पिता के श्राद्ध के बाद, जितनी सेविंग हम मिडल क्लास की होती हैं ना, अगर उसमें लात पड़ जाए तो हम एक बुखार के इलाज का खर्चा नहीं उठा पाएंगे शायद।

Thursday, January 26, 2017

मैं ठीक हूँ...

सच्ची घटना पर आधारित इस पोस्ट को यदि आप अच्छे से पढ़ेंगे तो अंत में आप एक गहरी सांस लेंगे और फिर ये पोस्ट जीवन भर आपके साथ चलेगी।
जो लोग जल्दी से निराश हो जाते हैं उनके जीवन के प्रति नज़रिये को भी बदलेगी।
।।मैं ठीक हूँ।।
AIMS नई दिल्ली 2003 । C5 वार्ड में ये बच्ची भर्ती थी।दरभंगा बिहार से रिफर की गयी थी।उम्र बारह वर्ष।
उसने मुझे जीवन का वो मंत्र दिया कि दुश्वारियां अब दुःख नहीं देतीं।उसका दिया मंत्र याद कर लो और दुःख छु मंतर।
उसे गुलैन् बारे सिंड्रोम (GBS) हुआ था।इस बीमारी में अचानक शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है।हाथ पैर दोनों बिलकुल भी हिला तक नहीं सकती थी।साथ ही छाती और साँस की मांसपेशियां भी काम नहीं करने से हमें उसे वेंटीलेटर पर रखना पड़ा।इस बीमारी में होश और बुद्धिमत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है ।
ज्यादार GBS दवाओं से जल्दी ही ठीक हो जाते हैं लेकिन कुछ प्रतिशत मरीज ठीक नहीं हो पाते।
1 हफ्ते वेंटीलेटर पर रखने के बाद हम समझ गए थे कि ये बच्ची अब लंबे समय वेंटीलेटर पर रहेगी।
हम सब आसानी से हर एक साँस ले पाते हैं बिना ताकत लगाये या कोशिश किये।क्योंकि ये आसानी से हो पा रहा है इसलिए हम साँस लेने की इस प्रक्रिया को सफलता नहीं मानते।
लेकिन इस बच्ची को एक साँस सफलता से लेनी थी।उसके लिए स्कूल में A ग्रेड लाना सफलता नहीं कुछ सांसे अच्छे से ले सकना सफलता थी।
वेंटीलेटर पर लंबा समय लगने की वजह से
हमने tracheostomy (गले वाले हिस्से से सांस की नली में छेद कर सांस के रास्ते को बनाने का निर्णय लिया).
और वेंटीलेटर को सांस के उस नए रास्ते से जोड़ा।अब ट्यूब उसके मुँह से निकाल दी गयी थी और कृत्रिम सांसें गले वाले
रास्ते से दी जा रही थीं। आवाज़ भी नहीं रही थी।
वो वेंटीलेटर पर होती आँखें खोले हुए।शरीर में सिर्फ पलकें और होंठ हिला सकती थी।सुबह राउंड केे समय मैं उससे रोज़ पूछता "" बेटा कैसी हो?"
रोज़ वो धीमे से मुस्काती और पलकों को धीमे से इस तरह झपकाती कि मैं समझ जाता उसका मतलब होता ठीक हूँ।
वो दो महीनों तक ऐसे ही वेंटीलेटर पर रही।ढेरों इंजेक्शन्स लगते ।ढेरों तकलीफ देय प्रक्रियाएं ।लेकिन जब भी पूछो पलकों से कहती "ठीक हूँ।"
मैंने इतना सहनशील और आशावादी मस्तिष्क जीवन में कभी नहीं देखा।धैर्य, सहनशीलता, उम्मीद न हारना ,स्वयं को प्रकृति के निर्णयों के प्रति समर्पित कर देना ,अपना रोना न रोना, देखभाल करने वालों पर भरोसा जैसे कितने ही गूढ़ दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य उसके इस छोटे से जवाब में निहित होते कि 'ठीक हूँ'।
उसने कभी नहीं कहा कि ये निकाल दो या अब बस करो।
उसका आशावादी दिमाग समझता था कि ये लोग कोशिश कर रहे हैं।धैर्य रखना होगा।सच ये था कि उसके कभी ठीक न हो सकने की सम्भावना बहुत थी। पर वो हमेशा कहती मैं ठीक हूँ।
उसकी माँ रोती रहती लेकिन उसकी आँखों में कभी आंसू नहीं दिखे।माँ ने बताया वो टीचर बनना चाहती थी।
दो महीने वेंटीलेटर पर रहने के बाद प्रकृति को दया आ ही गयी।उसकी सांस लेने की क्षमता बढ़ने लगी।। और चार महीने बाद डिस्चार्ज भी। सांस की नली का रास्ता बंद होने के बाद वो बोलने लगी थी।बातूनी और हंसमुख आजू बाजू के बेड वालों से सबसे दोस्ती।।जीवन से कोई शिकायत नहीं।मेरे ही साथ ये क्यों हुआ जैसा कोई प्रश्न नहीं।
जाते समय मैंने पुछा "तुम्हें बड़े हो कर क्या बनना है??
मै अपेक्षा कर रहा था बोलेगी टीचर लेकिन..............................................................
उसने मुस्कुरा कर आँखें बंद कर लीं फिर गहरी साँस ली सांस को कुछ देर रोक कर रखा फिर धीमे से छोड़ा।और कहा मज़ा आ गया। आँखे खोल कर बोली
"डॉक्टर जी बस सांसें आसानी से लेते रहना है बिना वेंटीलेटर केे ।बिना वेंटीलेटर के मिलने वाली हर सांस में मुझे मज़ा आता है।"
फिर मैंने भी यही किया गहरी सांस ली। मुझे ऐसा करते देख वो खिलखिलाई । वाक़ई दिमाग को और दिल को ऑक्सीजन पंहुचाना कितना मज़ेदार है।
मेरा प्रश्न 'क्या बनना है' बचकाना था और उसका उत्तर सयाना।
जिंदगी का महत्वपूर्ण पाठ आसानी से पढ़ा गयी थी वो नन्ही टीचर।
कुछ गहरी सांस लेकर देखिये मेरे साथ ।महसूस करिये कि सांस लेने के साथ ही दिमाग को ऑक्सीजन मिलती जा रही है।क्या हम सब सफलता से सांस ले पा रहे हैं? प्रकृति की सबसे कीमती गिफ्ट सांसों को हम आसानी से मिली होने की वजह से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यदि आप ले पाये तो आप बेहद अमीर और बेहद सफल हैं।
क्या बनना था और क्या बनेंगे ये बाद की बात है।
हर साँस का मज़ा लीजिये जब तक सांसें साथ हैं।
अव्यक्त।।।

Monday, January 23, 2017

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा

क्या आप भी अपने बच्चे को ‘बाबा ब्लैक शिप, हैव यू एनी वूल’ और ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटल स्टार’ वाले अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाते हैं? क्या आप भी अपने बच्चे को अंग्रेज़ी पढ़ा कर ‘साहब’ बनाने का सपना मन में पाले बैठे हैं? क्या आपको लगता है कि आपका बच्चा सिर्फ स्कूल जाकर ही एक सफल इंसान बन जाएगा? 
अगर आप ये सब करते हैं, सोचते हैं, तो मैं आज इतना ही कहूंगा कि आप भी वही गलती कर रहे हैं, जो गलती श्री रामेंद्र सरीन जी ने की थी। 
श्री रामेंद्र सरीन जी से मैं कभी नहीं मिला, लेकिन हरदोई के मेरे एक परिजन अशोक कुमार शुक्ला उनसे मिले थे। 
मुमकिन है कि अब तक आप भी श्री रामेंद्र सरीन जी के नाम से वाकिफ हो चुके हों, मुमकिन है कि आप अब तक उनके नाम से वाकिफ न भी हुए हों। मुझे उनके बारे में कल ही पता चल गया था, लेकिन मेरा मन कल उनके बारे में लिखने को बिल्कुल नहीं हुआ। मेरे मन में ऐसी ख़बरें अवसाद पैदा करती हैं और अवसाद से मैं बहुत बचना चाहता हूं। 
सरीन साहब की कहानी हमारी और आपकी कहानी से अलग नहीं। 
उन्होंने जीवन में वही किया, जो हम और आप कर रहे हैं। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि संजय सिन्हा फिर पहेली बुझाने लगे हैं, तो मैं आपकी शंका का समाधान करते हुए सीधे-सीधे मुद्दे पर आ जाता हूं। 
कुछ साल पहले सरीन साहब बरेली में दूरदर्शन के बड़े अधिकारी हुआ करते थे। इतने बड़े अधिकारी कि दो-चार नौकर घर पर रख सकते थे और अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा सकते थे। उन्होंने ये किया भी। हर महान बाप की तरह उन्होंने भी अपने बच्चे को शहरे के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाया। इस बात की पूरी जानकारी रखी कि बेटा ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटिल स्टार’ वाली कविता को ठीक से रट पाया है या नहीं। उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि कहीं उनके बेटे की स्कूल की यूनिफार्म में सलवटें तो नहीं पड़ गईं। बड़े लोगों की शान होती हैं ऐसी बातें। 
उनका बेटा खूब पढ़ा। स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से विदेश में नौकरी। किसी बाप के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। 
बाप का सपना पूरा हुआ। बेटे ने खूब पढ़ाई की। सरीन साहब ने बेटे को सब कुछ पढ़ाया, बस रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ा पाए। 
मुझे याद है, मैं तब जनसत्ता में नौकरी करता था। मेरे पिताजी मेरे छोटे भाई के पास बड़ौदा गए थे। एक शाम भाई ने फोन किया कि पिताजी की तबियत ख़राब है, भाई चले आओ। मैं उस दिन किसी वज़ह से बड़ौदा नहीं जा पाया था। मैं बड़ौदा नहीं गया, लेकिन मेरा मन बड़ौदा में पिताजी के पास जाकर अटक गया था। वो रात मैंने बिस्तर पर कैसे काटी थी, मैं ही जानता हूं। अगली सुबह मैं इंडियन एयरलाइंस का दफ्तर खुलने से पहले उसके काउंटर पर खड़ा था। काउंटर खुला, मैंने बड़ौदा का टिकट लिया, पर वापस लौटते हुए मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैंने देर कर दी है। 
घर आया तो पता चला कि पिताजी का निधन हो गया है। 
मैं शाम तक बड़ौदा पहुंच भी गया था, लेकिन मैंने आज तक खुद को उस देर के लिए माफ नहीं किया है। 
जानते हैं क्यों?
क्योंकि मेरे पिता मेरी स्कूली पढ़ाई से अधिक रिश्तों के विद्यालय में मुझे पढ़ाने में यकीन करते थे। उन्होंने हम दोनों भाइयों को रिश्तों के विद्यालय में कुछ इस तरह पढ़ाया था कि एक ऐसा वक्त भी था कि हम दोनों भाई पिता से इस बात पर नाराज़गी जताया करते थे कि आप रिटायर होने के बाद उसके पास मुझसे अधिक रुकते हैं। हम दोनों भाइयों के लिए हमारे पिता संसार के सबसे महान पिता थे और हम दोनों के सबसे अच्छे मित्र भी। यहां तक कि हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों को यह निर्देश दे रखा था कि किसी और से तुम्हारे रिश्ते चाहे जैसे हों, तुम उनसे चाहे जैसे अपने रिश्ते निभाओ, लेकिन तुम दोनों के व्यवहार से हमारे पिता के मन को कभी रत्ती भर तकलीफ नहीं होनी चाहिए। 
हमारे पिता की दोनों बहुओं ने जब तक पिताजी रहे, उनका पूरा मान रखा। 
दरअसल रिश्तों को लेकर हम दोनों भाई बहुत स्पष्ट थे। हम दोनों रिश्तों के जिस स्कूल से पढ़ कर निकले थे, वहां कभी हमने तोतला नहीं बोला। हम दोनों की समझ एकदम साफ थी। 
हम दोनों की समझ साफ थी, क्योंकि हमारे पिता की समझ रिश्तों को लेकर बिल्कुल साफ थी। 
पर सरीन साहब कहीं चूक गए। 
उन्होंने अपने बच्चे को सब कुछ पढ़ा दिया, पर रिश्तों का अर्थ नहीं पढ़ा पाए। 
हर आदमी को एक दिन काम से रिटायर हो जाना पड़ता है। सरीन साहब भी रिटायर हो गए। इस बीच उनकी पत्नी का निधन हो चुका था। 
सरीन साहब जब रिटायर हुए, तब उनका बेटा विदेश में नौकरी पा चुका था। वो विदेश में सेटल हो चुका था। 
पिता ने अगर बेटे को नौकरी के पाठ के साथ-साथ रिश्तों का पाठ भी पढ़ाया होता तो बूढ़ा बाप अकेला न रहता। 
काश ऐसा होता! 
रिटायर्ड बाप किस काम का? बूढ़ा बाप किस काम का? 
विदेश की चमकीली ज़िंदगी में टूटे दांतों वाला बूढ़ा बाप बेटे के लिए डस्टबिन से अधिक कुछ नहीं रह गया था। और ये डस्टबिन? 
मुझे नहीं पता, लेकिन वो पिछले कई वर्षों से वृद्धाश्रम में पड़ा था। और कल अखबारों में खबर छपी की दूरदर्शन से रिटायर्ड डायरेक्टर श्री रामेंद्र सरीन का शव दारू के ठेके के बाहर लावारिस पड़ा मिला। 
इसके आगे लिखने को क्या बचा? इसके आगे पढ़ने को भी क्या बचा है? संजय सिन्हा की उंगलियों ने कल इसे लिखने से मना कर दिया था। आज भी इस कहानी को लिखते हुए उनकी उंगलियां कांप रही हैं। 
मेरी कहानी का मर्म आप ये बिल्कुल मत निकालिएगा कि मैं सरीन साहब की औलाद को कोस रहा हूं। मैं सरीन साहब को ही कोस रहा हूं क्योंकि सच्चाई यही है कि अपनी व्यस्त ज़िंदगी में हम खुद ही अपनी संतान को बाबा ब्लैक शिप वाला पाठ तो पढ़ाते हैं, लेकिन रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ाते। जब हमने बच्चे को पढ़ाया ही नहीं कि रिश्तों का अर्थ क्या होता है, तो हमें बच्चे को कोसने का अधिकार भी नहीं। 
पहले अपनी सोच साफ करनी होती है, फिर किसी को कोसना होता है। आप भी अपने मन में झांकिए कि आपके पीछे कोई रोने वाला है या नहीं। 
जिनके पीछे रोने वाले नहीं होते, उनकी ज़िंदगी सरीन साहब जैसी ही गुजरती है। 
और इसके ज़िम्मेदार आप खुद होंगे, कोई और नहीं।

Friday, January 20, 2017

फेसबुक से साभार लिए गए प्रेरणादायक प्रसंगों का एक संग्रह

समय अभाव एवं जीवन की भागदौड़ के कारण हम लोग कुछ महत्वपूर्ण बातों एवं तथ्यों से अनजान रह जाते हैं। आप लोगों को ऐसे ही कुछ प्रेरणादायक लेखों से अवगत कराने का यह एक संक्षिप्त प्रयास भर है।

मैं उन लेखों के संबंधित लेखकों का उनकी पोस्ट के लिए लिंक सहित अग्रिम आभार व्यक्त करता हूँ। मुझे पूर्ण आशा है कि आप लोगों को मेरा यह प्रयास पसंद आएगा।