संजय सिन्हा
क्या आप भी अपने बच्चे को ‘बाबा ब्लैक शिप, हैव यू एनी वूल’ और ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटल स्टार’ वाले अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाते हैं? क्या आप भी अपने बच्चे को अंग्रेज़ी पढ़ा कर ‘साहब’ बनाने का सपना मन में पाले बैठे हैं? क्या आपको लगता है कि आपका बच्चा सिर्फ स्कूल जाकर ही एक सफल इंसान बन जाएगा?
अगर आप ये सब करते हैं, सोचते हैं, तो मैं आज इतना ही कहूंगा कि आप भी वही गलती कर रहे हैं, जो गलती श्री रामेंद्र सरीन जी ने की थी।
श्री रामेंद्र सरीन जी से मैं कभी नहीं मिला, लेकिन हरदोई के मेरे एक परिजन अशोक कुमार शुक्ला उनसे मिले थे।
मुमकिन है कि अब तक आप भी श्री रामेंद्र सरीन जी के नाम से वाकिफ हो चुके हों, मुमकिन है कि आप अब तक उनके नाम से वाकिफ न भी हुए हों। मुझे उनके बारे में कल ही पता चल गया था, लेकिन मेरा मन कल उनके बारे में लिखने को बिल्कुल नहीं हुआ। मेरे मन में ऐसी ख़बरें अवसाद पैदा करती हैं और अवसाद से मैं बहुत बचना चाहता हूं।
सरीन साहब की कहानी हमारी और आपकी कहानी से अलग नहीं।
उन्होंने जीवन में वही किया, जो हम और आप कर रहे हैं। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि संजय सिन्हा फिर पहेली बुझाने लगे हैं, तो मैं आपकी शंका का समाधान करते हुए सीधे-सीधे मुद्दे पर आ जाता हूं।
कुछ साल पहले सरीन साहब बरेली में दूरदर्शन के बड़े अधिकारी हुआ करते थे। इतने बड़े अधिकारी कि दो-चार नौकर घर पर रख सकते थे और अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा सकते थे। उन्होंने ये किया भी। हर महान बाप की तरह उन्होंने भी अपने बच्चे को शहरे के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाया। इस बात की पूरी जानकारी रखी कि बेटा ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटिल स्टार’ वाली कविता को ठीक से रट पाया है या नहीं। उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि कहीं उनके बेटे की स्कूल की यूनिफार्म में सलवटें तो नहीं पड़ गईं। बड़े लोगों की शान होती हैं ऐसी बातें।
उनका बेटा खूब पढ़ा। स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से विदेश में नौकरी। किसी बाप के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
बाप का सपना पूरा हुआ। बेटे ने खूब पढ़ाई की। सरीन साहब ने बेटे को सब कुछ पढ़ाया, बस रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ा पाए।
मुझे याद है, मैं तब जनसत्ता में नौकरी करता था। मेरे पिताजी मेरे छोटे भाई के पास बड़ौदा गए थे। एक शाम भाई ने फोन किया कि पिताजी की तबियत ख़राब है, भाई चले आओ। मैं उस दिन किसी वज़ह से बड़ौदा नहीं जा पाया था। मैं बड़ौदा नहीं गया, लेकिन मेरा मन बड़ौदा में पिताजी के पास जाकर अटक गया था। वो रात मैंने बिस्तर पर कैसे काटी थी, मैं ही जानता हूं। अगली सुबह मैं इंडियन एयरलाइंस का दफ्तर खुलने से पहले उसके काउंटर पर खड़ा था। काउंटर खुला, मैंने बड़ौदा का टिकट लिया, पर वापस लौटते हुए मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैंने देर कर दी है।
घर आया तो पता चला कि पिताजी का निधन हो गया है।
मैं शाम तक बड़ौदा पहुंच भी गया था, लेकिन मैंने आज तक खुद को उस देर के लिए माफ नहीं किया है।
जानते हैं क्यों?
क्योंकि मेरे पिता मेरी स्कूली पढ़ाई से अधिक रिश्तों के विद्यालय में मुझे पढ़ाने में यकीन करते थे। उन्होंने हम दोनों भाइयों को रिश्तों के विद्यालय में कुछ इस तरह पढ़ाया था कि एक ऐसा वक्त भी था कि हम दोनों भाई पिता से इस बात पर नाराज़गी जताया करते थे कि आप रिटायर होने के बाद उसके पास मुझसे अधिक रुकते हैं। हम दोनों भाइयों के लिए हमारे पिता संसार के सबसे महान पिता थे और हम दोनों के सबसे अच्छे मित्र भी। यहां तक कि हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों को यह निर्देश दे रखा था कि किसी और से तुम्हारे रिश्ते चाहे जैसे हों, तुम उनसे चाहे जैसे अपने रिश्ते निभाओ, लेकिन तुम दोनों के व्यवहार से हमारे पिता के मन को कभी रत्ती भर तकलीफ नहीं होनी चाहिए।
हमारे पिता की दोनों बहुओं ने जब तक पिताजी रहे, उनका पूरा मान रखा।
दरअसल रिश्तों को लेकर हम दोनों भाई बहुत स्पष्ट थे। हम दोनों रिश्तों के जिस स्कूल से पढ़ कर निकले थे, वहां कभी हमने तोतला नहीं बोला। हम दोनों की समझ एकदम साफ थी।
हम दोनों की समझ साफ थी, क्योंकि हमारे पिता की समझ रिश्तों को लेकर बिल्कुल साफ थी।
पर सरीन साहब कहीं चूक गए।
उन्होंने अपने बच्चे को सब कुछ पढ़ा दिया, पर रिश्तों का अर्थ नहीं पढ़ा पाए।
हर आदमी को एक दिन काम से रिटायर हो जाना पड़ता है। सरीन साहब भी रिटायर हो गए। इस बीच उनकी पत्नी का निधन हो चुका था।
सरीन साहब जब रिटायर हुए, तब उनका बेटा विदेश में नौकरी पा चुका था। वो विदेश में सेटल हो चुका था।
पिता ने अगर बेटे को नौकरी के पाठ के साथ-साथ रिश्तों का पाठ भी पढ़ाया होता तो बूढ़ा बाप अकेला न रहता।
काश ऐसा होता!
रिटायर्ड बाप किस काम का? बूढ़ा बाप किस काम का?
विदेश की चमकीली ज़िंदगी में टूटे दांतों वाला बूढ़ा बाप बेटे के लिए डस्टबिन से अधिक कुछ नहीं रह गया था। और ये डस्टबिन?
मुझे नहीं पता, लेकिन वो पिछले कई वर्षों से वृद्धाश्रम में पड़ा था। और कल अखबारों में खबर छपी की दूरदर्शन से रिटायर्ड डायरेक्टर श्री रामेंद्र सरीन का शव दारू के ठेके के बाहर लावारिस पड़ा मिला।
इसके आगे लिखने को क्या बचा? इसके आगे पढ़ने को भी क्या बचा है? संजय सिन्हा की उंगलियों ने कल इसे लिखने से मना कर दिया था। आज भी इस कहानी को लिखते हुए उनकी उंगलियां कांप रही हैं।
मेरी कहानी का मर्म आप ये बिल्कुल मत निकालिएगा कि मैं सरीन साहब की औलाद को कोस रहा हूं। मैं सरीन साहब को ही कोस रहा हूं क्योंकि सच्चाई यही है कि अपनी व्यस्त ज़िंदगी में हम खुद ही अपनी संतान को बाबा ब्लैक शिप वाला पाठ तो पढ़ाते हैं, लेकिन रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ाते। जब हमने बच्चे को पढ़ाया ही नहीं कि रिश्तों का अर्थ क्या होता है, तो हमें बच्चे को कोसने का अधिकार भी नहीं।
पहले अपनी सोच साफ करनी होती है, फिर किसी को कोसना होता है। आप भी अपने मन में झांकिए कि आपके पीछे कोई रोने वाला है या नहीं।
जिनके पीछे रोने वाले नहीं होते, उनकी ज़िंदगी सरीन साहब जैसी ही गुजरती है।
और इसके ज़िम्मेदार आप खुद होंगे, कोई और नहीं।
क्या आप भी अपने बच्चे को ‘बाबा ब्लैक शिप, हैव यू एनी वूल’ और ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटल स्टार’ वाले अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाते हैं? क्या आप भी अपने बच्चे को अंग्रेज़ी पढ़ा कर ‘साहब’ बनाने का सपना मन में पाले बैठे हैं? क्या आपको लगता है कि आपका बच्चा सिर्फ स्कूल जाकर ही एक सफल इंसान बन जाएगा?
अगर आप ये सब करते हैं, सोचते हैं, तो मैं आज इतना ही कहूंगा कि आप भी वही गलती कर रहे हैं, जो गलती श्री रामेंद्र सरीन जी ने की थी।
श्री रामेंद्र सरीन जी से मैं कभी नहीं मिला, लेकिन हरदोई के मेरे एक परिजन अशोक कुमार शुक्ला उनसे मिले थे।
मुमकिन है कि अब तक आप भी श्री रामेंद्र सरीन जी के नाम से वाकिफ हो चुके हों, मुमकिन है कि आप अब तक उनके नाम से वाकिफ न भी हुए हों। मुझे उनके बारे में कल ही पता चल गया था, लेकिन मेरा मन कल उनके बारे में लिखने को बिल्कुल नहीं हुआ। मेरे मन में ऐसी ख़बरें अवसाद पैदा करती हैं और अवसाद से मैं बहुत बचना चाहता हूं।
सरीन साहब की कहानी हमारी और आपकी कहानी से अलग नहीं।
उन्होंने जीवन में वही किया, जो हम और आप कर रहे हैं। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि संजय सिन्हा फिर पहेली बुझाने लगे हैं, तो मैं आपकी शंका का समाधान करते हुए सीधे-सीधे मुद्दे पर आ जाता हूं।
कुछ साल पहले सरीन साहब बरेली में दूरदर्शन के बड़े अधिकारी हुआ करते थे। इतने बड़े अधिकारी कि दो-चार नौकर घर पर रख सकते थे और अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा सकते थे। उन्होंने ये किया भी। हर महान बाप की तरह उन्होंने भी अपने बच्चे को शहरे के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाया। इस बात की पूरी जानकारी रखी कि बेटा ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटिल स्टार’ वाली कविता को ठीक से रट पाया है या नहीं। उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि कहीं उनके बेटे की स्कूल की यूनिफार्म में सलवटें तो नहीं पड़ गईं। बड़े लोगों की शान होती हैं ऐसी बातें।
उनका बेटा खूब पढ़ा। स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से विदेश में नौकरी। किसी बाप के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है।
बाप का सपना पूरा हुआ। बेटे ने खूब पढ़ाई की। सरीन साहब ने बेटे को सब कुछ पढ़ाया, बस रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ा पाए।
मुझे याद है, मैं तब जनसत्ता में नौकरी करता था। मेरे पिताजी मेरे छोटे भाई के पास बड़ौदा गए थे। एक शाम भाई ने फोन किया कि पिताजी की तबियत ख़राब है, भाई चले आओ। मैं उस दिन किसी वज़ह से बड़ौदा नहीं जा पाया था। मैं बड़ौदा नहीं गया, लेकिन मेरा मन बड़ौदा में पिताजी के पास जाकर अटक गया था। वो रात मैंने बिस्तर पर कैसे काटी थी, मैं ही जानता हूं। अगली सुबह मैं इंडियन एयरलाइंस का दफ्तर खुलने से पहले उसके काउंटर पर खड़ा था। काउंटर खुला, मैंने बड़ौदा का टिकट लिया, पर वापस लौटते हुए मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैंने देर कर दी है।
घर आया तो पता चला कि पिताजी का निधन हो गया है।
मैं शाम तक बड़ौदा पहुंच भी गया था, लेकिन मैंने आज तक खुद को उस देर के लिए माफ नहीं किया है।
जानते हैं क्यों?
क्योंकि मेरे पिता मेरी स्कूली पढ़ाई से अधिक रिश्तों के विद्यालय में मुझे पढ़ाने में यकीन करते थे। उन्होंने हम दोनों भाइयों को रिश्तों के विद्यालय में कुछ इस तरह पढ़ाया था कि एक ऐसा वक्त भी था कि हम दोनों भाई पिता से इस बात पर नाराज़गी जताया करते थे कि आप रिटायर होने के बाद उसके पास मुझसे अधिक रुकते हैं। हम दोनों भाइयों के लिए हमारे पिता संसार के सबसे महान पिता थे और हम दोनों के सबसे अच्छे मित्र भी। यहां तक कि हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों को यह निर्देश दे रखा था कि किसी और से तुम्हारे रिश्ते चाहे जैसे हों, तुम उनसे चाहे जैसे अपने रिश्ते निभाओ, लेकिन तुम दोनों के व्यवहार से हमारे पिता के मन को कभी रत्ती भर तकलीफ नहीं होनी चाहिए।
हमारे पिता की दोनों बहुओं ने जब तक पिताजी रहे, उनका पूरा मान रखा।
दरअसल रिश्तों को लेकर हम दोनों भाई बहुत स्पष्ट थे। हम दोनों रिश्तों के जिस स्कूल से पढ़ कर निकले थे, वहां कभी हमने तोतला नहीं बोला। हम दोनों की समझ एकदम साफ थी।
हम दोनों की समझ साफ थी, क्योंकि हमारे पिता की समझ रिश्तों को लेकर बिल्कुल साफ थी।
पर सरीन साहब कहीं चूक गए।
उन्होंने अपने बच्चे को सब कुछ पढ़ा दिया, पर रिश्तों का अर्थ नहीं पढ़ा पाए।
हर आदमी को एक दिन काम से रिटायर हो जाना पड़ता है। सरीन साहब भी रिटायर हो गए। इस बीच उनकी पत्नी का निधन हो चुका था।
सरीन साहब जब रिटायर हुए, तब उनका बेटा विदेश में नौकरी पा चुका था। वो विदेश में सेटल हो चुका था।
पिता ने अगर बेटे को नौकरी के पाठ के साथ-साथ रिश्तों का पाठ भी पढ़ाया होता तो बूढ़ा बाप अकेला न रहता।
काश ऐसा होता!
रिटायर्ड बाप किस काम का? बूढ़ा बाप किस काम का?
विदेश की चमकीली ज़िंदगी में टूटे दांतों वाला बूढ़ा बाप बेटे के लिए डस्टबिन से अधिक कुछ नहीं रह गया था। और ये डस्टबिन?
मुझे नहीं पता, लेकिन वो पिछले कई वर्षों से वृद्धाश्रम में पड़ा था। और कल अखबारों में खबर छपी की दूरदर्शन से रिटायर्ड डायरेक्टर श्री रामेंद्र सरीन का शव दारू के ठेके के बाहर लावारिस पड़ा मिला।
इसके आगे लिखने को क्या बचा? इसके आगे पढ़ने को भी क्या बचा है? संजय सिन्हा की उंगलियों ने कल इसे लिखने से मना कर दिया था। आज भी इस कहानी को लिखते हुए उनकी उंगलियां कांप रही हैं।
मेरी कहानी का मर्म आप ये बिल्कुल मत निकालिएगा कि मैं सरीन साहब की औलाद को कोस रहा हूं। मैं सरीन साहब को ही कोस रहा हूं क्योंकि सच्चाई यही है कि अपनी व्यस्त ज़िंदगी में हम खुद ही अपनी संतान को बाबा ब्लैक शिप वाला पाठ तो पढ़ाते हैं, लेकिन रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ाते। जब हमने बच्चे को पढ़ाया ही नहीं कि रिश्तों का अर्थ क्या होता है, तो हमें बच्चे को कोसने का अधिकार भी नहीं।
पहले अपनी सोच साफ करनी होती है, फिर किसी को कोसना होता है। आप भी अपने मन में झांकिए कि आपके पीछे कोई रोने वाला है या नहीं।
जिनके पीछे रोने वाले नहीं होते, उनकी ज़िंदगी सरीन साहब जैसी ही गुजरती है।
और इसके ज़िम्मेदार आप खुद होंगे, कोई और नहीं।
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