Sunday, January 22, 2017

सही का हीरो

डॉ. अव्यक्त अग्रवाल 
।।सही का हीरो।। #AapkeHeroes
12 साल का एक बच्चा ।मेडिकल ओपीडी विशेषज्ञ कक्ष में।
मेरी टेबल पर स्लिप रख कर बड़े आत्मविश्वास से बोला "सर मुझे देख लीजिये।"
मैंने लैपटॉप से नज़र हटा कर जूनियर डॉक्टर्स के कमरे की ओर इशारा कर कहा पहले वहाँ दिखा लो ।
उसने कहा "नहीं सर आप ही देखो।"
उसने मेरी बात नहीं मानी थी लेकिन उसका आत्मविश्वास मुझे अच्छा लगा।
मैंने मुस्कुरा कर कहा "बैठो।"
उसे बेल्स पाल्सी थी।
जिसमें चेहरे के एक ओर की मांसपेशी अचानक कमज़ोर हो जाती है।और तिरछापन आ जाता है।
वो चिंतित था इस अजीब समस्या से।
मुझसे कहा "मैँ ठीक तो हो जाऊंगा न सर।"
मैंने कहा" हाँ 1 महीने में पक्का।
तुम कन्हाँ के हो?"
"सर कटनी।"
कटनी तो जबलपुर से 100 कि मीटर दूर है।किसके साथ आये हो।"
उसने कहा "अकेले"
मुझे आश्चर्य हुआ छोटा बच्चा अकेले इलाज केे लिए। इतने दूर और आत्मविश्वास से ओपीडी स्लिप कटवा के मुझसे बात करते हुए।
कुछ देर बात करने पर उसने बताया कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है।
वो एक कंप्यूटर कोचिंग संस्थान के लिए प्रचार करने और नए नए स्टूडेंट्स लाने का काम करता है।साथ ही उसके मालिक उसे कंप्यूटर भी सिखाते हैं।
मैंने पुछा "और स्कूल"???
उसने दम्भ के साथ कहा "वो भी जाता हूँ।"
"अच्छा क्या बनना चाहते हो"???
उसने कहा "अपने छोटे भाई के साथ मिल कर अपना कंप्यूटर सेंटर खोलूंगा।" उसने ये नहीं कहा था कि सेंटर खोलना चाहता हूँ।उसने कहा था सेंटर खोलूंगा।टपकता हुआ रचनात्मक आत्मविश्वास।
उसने बताया घर पर
उसकी माँ बीमार रहती है और एक छोटा भाई भी है जिनकी वो देखभाल करता है।इसलिए जल्दी ठीक होना है।
मैंने उससे कहा "क्या तुम मेरी एक क्लास समाप्त होने के बाद कुछ देर के लिए मेरे घर चल सकते हो।"
उसने हामी भर दी।
मैं अपने बच्चों को असल जिंदगी के एक हीरो से मिलाना चाहता था। वो अकेला उस भीड़ में जिंदगी से हंस कर संघर्ष कर रहा था।उसके सपने ना सिर्फ खुद के लिए बल्कि भाई के लिए भी थे।जिंदगी जिसे ठोकर मारती आयी थी वो जिंदगी को माफ़ कर आगे बढ़ रहा था।
क्या हम किसी चाय बेचने वाले के तभी गुणगान करें जब वो मुख्यमंत्री बन जाये।चाय बेचते समय क्या उसके संघर्ष को पहचाना जा सकता है।
असल जिंदगी में मुझे टीवी के ब्रांडेड हीरो से बड़े हीरो दिख जाते हैं।
एक विकलांग पिता अपनी 'तीन पहियो' की स्कूटर में अपने बच्चे के लिए 'दो पहियों' की साइकिल ले जाते दिखा।
एक माँ मेरे क्लिनिक पर आती है जिनके दोनों बच्चों को आटिज्म है।बहुत ऊधम करते हैं दोनों।लेकिन वो खुशी से उनकी देख रेख करती है।
क्लिनिक पर ही आने वाली एक पत्नी जिसने अपने उस पति को किडनी दीं जिसने बीमार होने के पहले उसे डिवोर्स दे दिया था।
जीवन से जो लोग रचनात्मक संघर्ष करते हैं स्वयं के लिए अपनों के लिए और दूसरों के लिए उन सभी unsung heroes को मेरा नमन।
।।अव्यक्त।।

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