Saturday, January 28, 2017

बच्चों का दिमागी विकास खेल खेल में

30 Point system a psychological trick
5 साल से ऊपर के बच्चों के लिए एक आसान लेकिन असरदार मनोवैज्ञानिक ट्रिक ।
करना सिर्फ इतना है माता पिता को कि बच्चे को किसी भी अच्छे काम के लिए कुछ पॉइंट्स देने हैं और गलत काम के लिए पॉइंट्स घटाने हैं।जब बच्चों के पास निश्चित पॉइंट्स इकट्ठे हो जाएँ तब उन्हें कोई भी छोटी या उनकी मनपसंद गिफ्ट दीजिये।
जैसे पार्क ले जाना या कोई फ़िल्म दिखाना या कोई खेल का सामान या एक अच्छी बुक या कोई मनपसंद खाना देना।जब आप ये गिफ्ट दे दें तो नए सिरे से पॉइंट शुरू करिये।बड़ी गलती पर पॉइंट्स 0 भी किये जा सकते हैं ये बता कर रखिये।
पॉइंट देते समय थोड़ा उदार रहिये।लचीलापन रखिये।छोटी मोटी शैतानियों को नज़रअंदाज़ करिये।पॉइंट कितने और कब देने हैं ये अधिकार सिर्फ अपने पास रखिये।पॉइंट लिखने की ज़रूरत नहीं आपको याद रहेंगे।लेकिन बच्चे को पहले से बता कर रखिये कि तुम्हें 30 पॉइंट्स कमाने पर गिफ्ट मिलेगी।गिफ्ट मिलने पर पॉइंट 0 और फिर वही प्रक्रिया शुरू करनी है।बच्चा चाहे तो बड़ी गिफ्ट जैसे साइकिल के लिए पॉइंट्स इकठ्ठा भी कर सकता है।
अच्छे काम किसी भी तरह के हो सकते हैं जैसे बड़ों की बात मानना,कोई प्यारी मीठी बात कहना,पौधों को पानी देना,होमवर्क पूरा करना,किसी प्रतियोगिता में अपना अच्छा प्रयास करना,भाई या बहन की केअर करना,स्कूल जाने में नहीं रोना इत्यादि।
फायदे:
1.पहला फायदा तो इस खेल में बच्चों को मज़ा बहुत आता है।साथ ही माता पिता का उनकी गतिविधयों में सम्मिलित होना उनमें सुरक्षा की भावना जगाता है।
2.बच्चों को बिना सजा दिए ही गलती पर आप हतोत्साहित कर पाएंगे।और गलत काम से नुकसान होता है यह सन्देश जीवन भर के लिए बच्चे के दिमाग में समाहित करवा पाएंगे।
3.इस खेल में बच्चों को पॉइंट्स कमाने पड़ते हैं जिससे उनमें कुछ अच्छा करके कमाने की भावना जाग्रत होती है।मेहनत करने का महत्व पता चलता है।
4.पॉइंट कम हो जाने पर पॉइंट फिर से मिल सकते हैं जिससे persevernce/जुटे रहने की भावना विकसित होती है।
5.जन्हाँ दो बच्चे 5 साल के ऊपर हों वँहा स्वस्थ प्रतियोगिता उत्पन्न होती है।
6.बड़े होने पर ये खेल उनके दिमाग में आपकी यादों का एक अहम् हिस्सा होगा।
7.हम खेल खेल में उन्हें बेहतर नागरिक बना सकते हैं।जैसे कचरा डस्टबिन में ही फेंकने पर 10 पॉइंट्स।
8.इस तरह कमाई हुई गिफ्ट उनके लिए सिर्फ गिफ्ट ना हो कर सफलता और जीत का अहसास होती है।बच्चा ज़्यादा खुश होता है अपने आप मिली गिफ्ट की तुलना में।
ये कितना प्रभावी है?
यूँ तो हर बच्चा एवं माता पिता अलग अलग होते हैं।और पेरेंटिंग प्रकृति खुद ही सिखा देती है।हमसे बहुत बेहतर पेरेंट्स भी होंगे और उनके अपने तरीके भी प्रभावी होंगे lपरन्तु फिर भी....इस आसान से खेल का प्रयोग मैंने अपने दोनों बच्चों को तैराकी चैंपियन बनाने के लिए किया था।
जब रिजल्ट मिले तो मोहल्ले के बच्चों और अपने मरीजों को भी इसमें शामिल किया।मुझे 90 प्रतिशत माता पिता ने इस खेल के प्रभावी होने की बात कही।
कुछ माएं जो बच्चों को मारती थीं उन्होंने भी मारना बंद कर दिया क्योंकि उनके हाथ में अब एक अहिंसक सजा वाला हथियार था।
इस्तेमाल करिये और 10 दिन बाद review ज़रूर दीजिये।
आपका डॉ अव्यक्त

Friday, January 27, 2017

चिकेनपॉक्स (छोटी माता)


चिकेनपॉक्स(छोटी माता)
भ्रांतियां:
1.चिकेनपॉक्स माता या दैवीय प्रकोप से होता है।
2.हर एक दाने या rashes वाली बीमारियां माता या चिकेनपॉक्स होती हैं।
3.माता होने पर किसी तरह के इलाज की ज़रुरत नहीं।
4.चावल नहीं खाने या परहेज करने से माता 6 से सात दिन में ठीक हो जाती हैं।
5.माता की कोई भी रोकथाम नहीं है।
सच:बिंदुवार
1.चिकेनपॉक्स varicella zoster नामक वायरस से होने वाली एक बीमारी है।यह वायरस बहुत तेज़ी से एक मरीज़ से दुसरे में फैलता है।और कभी कभी तो घर के सभी सदस्यों या पूरे गांव में फ़ैल जाता है।
ये वायरस दुनिया के सभी देशों में चिकेनपॉक्स करवाता है।अतः ये माता न हो कर एक प्रकार का वायरस संक्रमण है।
2.rash या दानों के साथ होने वाले बुखार सैकड़ों हैं।चिकित्सक लक्षण और rash देख कर आसानी से पहचान सकते हैं चिकेनपॉक्स को।
3.चिकेनपॉक्स के वायरस को मारने के लिए acyclovir एक असरदार दवा है।इससे मरीज़ जल्दी ठीक होता है।दूसरों को वायरस कम फैलता है।और मरीज को वायरस से होने वाले complications नहीं होते।
माता के 10 प्रतिशत मरीजों को गंभीर complications हो सकते हैं।
4.वायरस संक्रमण में परहेज का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं।
चिकेनपॉक्स 90 प्रतिशत मरीजों में बिना किसी दवा के ही 7 दिन में ठीक हो जाता है।परहेज करो या न करो।
5.माता या चिकेनपॉक्स से बचाव का टीका आता है।
जो कि ज़िंदगी भर के लिए 90 प्रतिशत तक सुरक्षा देता है।इस टीके की कीमत 1500 से 1700 र के बीच होती है।
आपका डॉ अव्यक्त
ज्ञान की रोशनी जितने भी माध्यम हों जिस भी तरह से हो फैलती रहनी चाहिए।


Thursday, January 26, 2017

मैं ठीक हूँ...

सच्ची घटना पर आधारित इस पोस्ट को यदि आप अच्छे से पढ़ेंगे तो अंत में आप एक गहरी सांस लेंगे और फिर ये पोस्ट जीवन भर आपके साथ चलेगी।
जो लोग जल्दी से निराश हो जाते हैं उनके जीवन के प्रति नज़रिये को भी बदलेगी।
।।मैं ठीक हूँ।।
AIMS नई दिल्ली 2003 । C5 वार्ड में ये बच्ची भर्ती थी।दरभंगा बिहार से रिफर की गयी थी।उम्र बारह वर्ष।
उसने मुझे जीवन का वो मंत्र दिया कि दुश्वारियां अब दुःख नहीं देतीं।उसका दिया मंत्र याद कर लो और दुःख छु मंतर।
उसे गुलैन् बारे सिंड्रोम (GBS) हुआ था।इस बीमारी में अचानक शरीर लकवाग्रस्त हो जाता है।हाथ पैर दोनों बिलकुल भी हिला तक नहीं सकती थी।साथ ही छाती और साँस की मांसपेशियां भी काम नहीं करने से हमें उसे वेंटीलेटर पर रखना पड़ा।इस बीमारी में होश और बुद्धिमत्ता पर कोई फर्क नहीं पड़ता है ।
ज्यादार GBS दवाओं से जल्दी ही ठीक हो जाते हैं लेकिन कुछ प्रतिशत मरीज ठीक नहीं हो पाते।
1 हफ्ते वेंटीलेटर पर रखने के बाद हम समझ गए थे कि ये बच्ची अब लंबे समय वेंटीलेटर पर रहेगी।
हम सब आसानी से हर एक साँस ले पाते हैं बिना ताकत लगाये या कोशिश किये।क्योंकि ये आसानी से हो पा रहा है इसलिए हम साँस लेने की इस प्रक्रिया को सफलता नहीं मानते।
लेकिन इस बच्ची को एक साँस सफलता से लेनी थी।उसके लिए स्कूल में A ग्रेड लाना सफलता नहीं कुछ सांसे अच्छे से ले सकना सफलता थी।
वेंटीलेटर पर लंबा समय लगने की वजह से
हमने tracheostomy (गले वाले हिस्से से सांस की नली में छेद कर सांस के रास्ते को बनाने का निर्णय लिया).
और वेंटीलेटर को सांस के उस नए रास्ते से जोड़ा।अब ट्यूब उसके मुँह से निकाल दी गयी थी और कृत्रिम सांसें गले वाले
रास्ते से दी जा रही थीं। आवाज़ भी नहीं रही थी।
वो वेंटीलेटर पर होती आँखें खोले हुए।शरीर में सिर्फ पलकें और होंठ हिला सकती थी।सुबह राउंड केे समय मैं उससे रोज़ पूछता "" बेटा कैसी हो?"
रोज़ वो धीमे से मुस्काती और पलकों को धीमे से इस तरह झपकाती कि मैं समझ जाता उसका मतलब होता ठीक हूँ।
वो दो महीनों तक ऐसे ही वेंटीलेटर पर रही।ढेरों इंजेक्शन्स लगते ।ढेरों तकलीफ देय प्रक्रियाएं ।लेकिन जब भी पूछो पलकों से कहती "ठीक हूँ।"
मैंने इतना सहनशील और आशावादी मस्तिष्क जीवन में कभी नहीं देखा।धैर्य, सहनशीलता, उम्मीद न हारना ,स्वयं को प्रकृति के निर्णयों के प्रति समर्पित कर देना ,अपना रोना न रोना, देखभाल करने वालों पर भरोसा जैसे कितने ही गूढ़ दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक रहस्य उसके इस छोटे से जवाब में निहित होते कि 'ठीक हूँ'।
उसने कभी नहीं कहा कि ये निकाल दो या अब बस करो।
उसका आशावादी दिमाग समझता था कि ये लोग कोशिश कर रहे हैं।धैर्य रखना होगा।सच ये था कि उसके कभी ठीक न हो सकने की सम्भावना बहुत थी। पर वो हमेशा कहती मैं ठीक हूँ।
उसकी माँ रोती रहती लेकिन उसकी आँखों में कभी आंसू नहीं दिखे।माँ ने बताया वो टीचर बनना चाहती थी।
दो महीने वेंटीलेटर पर रहने के बाद प्रकृति को दया आ ही गयी।उसकी सांस लेने की क्षमता बढ़ने लगी।। और चार महीने बाद डिस्चार्ज भी। सांस की नली का रास्ता बंद होने के बाद वो बोलने लगी थी।बातूनी और हंसमुख आजू बाजू के बेड वालों से सबसे दोस्ती।।जीवन से कोई शिकायत नहीं।मेरे ही साथ ये क्यों हुआ जैसा कोई प्रश्न नहीं।
जाते समय मैंने पुछा "तुम्हें बड़े हो कर क्या बनना है??
मै अपेक्षा कर रहा था बोलेगी टीचर लेकिन..............................................................
उसने मुस्कुरा कर आँखें बंद कर लीं फिर गहरी साँस ली सांस को कुछ देर रोक कर रखा फिर धीमे से छोड़ा।और कहा मज़ा आ गया। आँखे खोल कर बोली
"डॉक्टर जी बस सांसें आसानी से लेते रहना है बिना वेंटीलेटर केे ।बिना वेंटीलेटर के मिलने वाली हर सांस में मुझे मज़ा आता है।"
फिर मैंने भी यही किया गहरी सांस ली। मुझे ऐसा करते देख वो खिलखिलाई । वाक़ई दिमाग को और दिल को ऑक्सीजन पंहुचाना कितना मज़ेदार है।
मेरा प्रश्न 'क्या बनना है' बचकाना था और उसका उत्तर सयाना।
जिंदगी का महत्वपूर्ण पाठ आसानी से पढ़ा गयी थी वो नन्ही टीचर।
कुछ गहरी सांस लेकर देखिये मेरे साथ ।महसूस करिये कि सांस लेने के साथ ही दिमाग को ऑक्सीजन मिलती जा रही है।क्या हम सब सफलता से सांस ले पा रहे हैं? प्रकृति की सबसे कीमती गिफ्ट सांसों को हम आसानी से मिली होने की वजह से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यदि आप ले पाये तो आप बेहद अमीर और बेहद सफल हैं।
क्या बनना था और क्या बनेंगे ये बाद की बात है।
हर साँस का मज़ा लीजिये जब तक सांसें साथ हैं।
अव्यक्त।।।

Monday, January 23, 2017

वैक्सीन

डॉ. अव्यक्त अग्रवाल

आज़ बच्चों एवं बड़ों को विभिन्न बीमारियों से बचाव के ढेरों वैक्सीन आ गए हैं एवं नए टीके, डेंगू जैसी बीमारी से बचाव के ज़ल्द आने की उम्मीद है।
कुछ महत्वपुर्ण टीके सरकार मुफ़्त देती है वहीँ कुछ टीके सिर्फ़ प्राइवेट सेक्टर में दिए जाते हैं। कुछ टीके बहुत महंगे भी होते हैं।
टीके करते क्या हैं? और टीकों में होता क्या है?
अधिकांश टीकों में मरे हुए वायरस अथवा बैक्टेरिया होते हैं या फ़िर कमज़ोर कर दिए गए जीवित वायरस (live attenuated vaccines) जिससे यह टीके शरीर में जा कर इन कीटाणुओं के ख़िलाफ़ लड़ने वाली प्राकृतिक एंटीबाडी के उत्पन्न होने का कारण बनते हैं। ज़बकि मरे हुए होने या कमज़ोर होने से बीमारी नहीं करवाते।
अलग अलग बीमारियों में उत्पन्न एंटीबाडी अलग अलग समय तक जीवित रहती हैं।
जैसे चिकनपॉक्स ,खसरे , हेपेटाइटिस बी एवं A में जीवन भर तक।
ज़बकि टिटेनस, टाइफाइड, जैसी बीमारियों में कुछ वर्ष।
इन्फ्लुएंजा ,स्वाइन फ्लू वायरस साल दर साल खुद में बदलाव करता है इसलिए यह वेक्सीन प्रति वर्ष लगवाना पड़ता है।
अब मैं पहले जन्म से ले कर 5 वर्ष तक के टीकों का नाम लिखता हूँ।
फ़िर प्राइवेट में दिए जाने वाले टीकों की कीमत, महत्त्व और क्यों वे महंगे हैं लिखूंगा।
जन्म:
Bcg, Opv (polio drop), hepatitis B
6 सप्ताह की उम्र:
DPT, Injection polio, Hib,Hipetitis B,Oral Polio, Pneumococcal (Pcv), Rotavirus
10 सप्ताह: same as 6 weeks...except Hipetitis B
14 weeks: same as 6 weeks
9 months: MMR, typhoid conjugate vaccine
1 वर्ष: Hipetitis A,
15 months: MMR
16 months: chickenpox
18 months: DPT, injection polio,oral polio, Pcv booster
2years: typhoid
5 years : typhoid, DPT, chickenpox
10 years: tetanus, typhoid
लड़कियों को 10 से 45 वर्ष की उम्र तक cervical cancer(गर्भाशय कैंसर) से बचाव का टीका लग सकता है।
अब आते हैं उपरोक्त लिखे टीकों में से वे टीके जो सिर्फ़ प्राइवेट में मिलते हैं।
पहले यह बता दूं कि पेंटावेलेंट टीका भारत सरकार ने अपने कार्यक्रम में शामिल किया है विगत वर्षों में।
1. Rotavirus vaccine
तीन dose 1-1, माह के अंतराल में 6 सप्ताह के ऊपर लगती है। और 6 माह की उम्र के भीतर तीनों dose हो जाना चाहिए।
यह वैक्सीन बच्चों में उल्टी दस्त होने के सबसे बड़े कारण rotavirus से रक्षा करता है। रोटा वायरस से भारत जैसे विकासशील देशों में प्रतिवर्ष करोड़ों बच्चे भर्ती होते हैं और मृत्यु भी होती हैं।
कीमत अलग अलग ब्रांड्स की 700 से 1400 rs तक है।
सरकारी कार्यक्रम में यह टीका मुफ़्त शामिल किये जाने की तैयारियां चल रही हैं।
लेकिन शायद वक़्त लगेगा।
2. Pcv या pneumococcal:
यह टीका न्यूमोनिया, मस्तिष्क ज्वर , सेप्टिसमिया ( गम्भीर रक्त संक्रमण),कान एवं गले के इन्फेक्शन
से रक्षा करता है।
न्यूमोकॉकल बैक्टेरिया के ख़िलाफ़ लड़कर।
दो प्रमुख ब्रांड आते हैं ।
एक की एमआरपी 1600 rs है तो दूसरे की 3800 rs।
3.टाइफाइड conjugate वैक्सीन: यह टायफाइड का नया टीका है। लेकिन महंगा है। mrp 1800 rs के करीब है।
पहले का सस्ता टीका सिर्फ़ 2 वर्ष की उम्र के बाद ही दिया जा सकता था और मात्र 3 वर्ष के लिए सुरक्षा देता था वो भी 60 प्रतिशत।
नया टीका 90 प्रतिशत सुरक्षा 5 वर्षों के लिए देता है ,साथ ही 9 माह की उम्र पर या उसके बाद भी दिया जा सकता है।
Hipatitis A : यह टीका बेहद कारगर टीका है। मात्र एक dose जीवन भर सुरक्षा देती है hepatitis A के ख़िलाफ़।
हिपेटाइटिस A बच्चों एवं बड़ों में होने वाले पीलिया के 90 प्रतिशत मरीजों में पीलिया का कारण होता है।
इसकी कीमत 1300 rs के क़रीब है।
कुछ ब्रांड दो dose 6 माह के अंतर से लगते हैं तो कुछ
ब्रांड एक ही dose काफी है।
Varicella वैक्सीन: यह वैक्सीन चिकेन्पोक्स से बचाव करता है।
कीमत 1600 से 2100 rs के बीच है अलग अलग ब्रांड की।
एक dose भी 90 प्रतिशत से ज़्यादा सुरक्षा देती है। किन्तु दो dose ले सकें तो बेहतर।
MMR : सबसे सस्ता और सबसे अच्छा वैक्सीन।
तीन बीमारियों से आजीवन रक्षा करता है।।
M for ..mumps...या गलसुआ
M for measels या खसरा
R for rubella..
15 माह की बच्ची को लगा mmr न सिर्फ़ उस बच्ची की रक्षा वरन् उसके बड़े होने पर उस बच्ची के को होने वाले बच्चे को गंभीर जन्मजात रोगों से सुरक्षा देता है।
यह वैक्सीन मैं तो कहूँगा भारत की हर लड़की को लगा होना चाहिए। शादी के पहले ही।
स्वाइन फ्लू वैक्सीन: यह वैक्सीन स्वाइन फ्लू के अलावा सामान्य फ्लू से भी रक्षा करता है। लेकिन सिर्फ एक वर्ष।
दो प्रकार का मिलता है।
इंजेक्शन के रूप में और नाक के स्प्रे के रूप में।
इंजेक्शन 6 माह क ऊपर किसी भी उम्र में लगाया जा सकता है। नाक का स्प्रे 2 वर्ष के बाद।
70 प्रतिशत के लगभग सुरक्षा देता है। साइड इफ़ेक्ट आम तौर पर कुछ भी नहीं। कीमत 700 rs से 800 के लगभग।
Menigococcal वैक्सीन:
कीमत 4000 रूपये लगभग
गंभीर मस्तिष्क ज्वर और रक्त संक्रमण से बचाव।
कुछ और जानकारियां:
1. कोई भी वैक्सीन 100 प्रतिशत सुरक्षा नहीं देता। 90 प्रतिशत से ज़्यादा सुरक्षा देने वाला वैक्सीन बहुत अच्छा माना जाता है।
2. वैक्सीन लगने के 10 दिन के बाद ही सुरक्षा मिलना शुरू होती है।
मतलब...
जैसे, आज़ आपने चिकेनपॉक्स टीका लगवाया लेकिन यदि आपने चिकेनपोक्स वायरस का संक्रमण एक हफ्ते पहले ग्रहण किया था तो आप अगले दो दिन में टीका लगा होने के बावज़ूद बीमार हो सकते हैं।
ज़्यादातर टीके बेहद सुरक्षित होते हैं।
Dpt से बुखार आता है, दर्द होता है और बहुत कम केसेस में झटके आ सकते हैं।
गंभीर रिएक्शन किसी भी टीके से हो सकती है लेकिन इसकी सम्भावना लाखों में एक है। ज़बकि बीमारी की सम्भावना 100 में एक।
दर्द रहित dpt भी आता है। जो दर्द एवं बुखार नहीं करता।
कुछ अन्य टीकों के साथ मिला कर बने ब्रांड की कीमत 2200 rs के आसपास है।
मैंने अपने बच्चों को दर्द वाले लगाये थे और यही सलाह मरीजों को भी देता हूँ।
क्योंकि कुछ शोध में बीमारी से सुरक्षा का स्तर दर्द रहित डीपीटी में कम पाया गया। फिर यह काफी महंगा भी है।
4. टीकों का #तापमान #कण्ट्रोल सबसे ज़्यादा अहम् है।
और इस काम की ट्रेनिंग सभी शिशु रोग विशेषज्ञों को दी जाती है।
टीकाकरण फ़ाइल में ग्रोथ चार्ट भी होता है। शिशु रोग विशेषज्ञ का फ़र्ज़ है कि उस ग्रोथ कर्व को मेंटेन भी करे।
5. क्या टीके वयस्कों को लग सकते हैं?
उत्तर है हाँ....
बहुत से टीके वयस्कों को भी लगना चाहिए। ऐसी बीमारियों के जो वयस्कों को भी होती हैं। जैसे typhoid,chickenpox, hepatitis A,MMR,swine Flu
जब टीका 100 में से 10 लोगों को लगता है तो बाक़ी के 90 को भी फायदा होता है क्योंकि कीटाणु का संक्रमण फैलने की गति कम हो जाती है एक से दूसरे व्यक्ति में ।
नए टीकों की कीमत ज़्यादा होती है। जब करोड़ों लोग लगवाने लगते हैं तब कीमत कम हो जाती है।
ज़्यादातर टीके भारत में नहीं बनते। इम्पोर्ट होते हैं। rotavirus का एक ब्रांड भारत में विकसित हुआ है।
An ounce of prevention is worth a pound of cure.
Benjamin Franklin
स्वस्थ जन
समृद्ध राष्ट्र
आपका
डॉ अव्यक्त

संजय सिन्हा

संजय सिन्हा

क्या आप भी अपने बच्चे को ‘बाबा ब्लैक शिप, हैव यू एनी वूल’ और ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटल स्टार’ वाले अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाते हैं? क्या आप भी अपने बच्चे को अंग्रेज़ी पढ़ा कर ‘साहब’ बनाने का सपना मन में पाले बैठे हैं? क्या आपको लगता है कि आपका बच्चा सिर्फ स्कूल जाकर ही एक सफल इंसान बन जाएगा? 
अगर आप ये सब करते हैं, सोचते हैं, तो मैं आज इतना ही कहूंगा कि आप भी वही गलती कर रहे हैं, जो गलती श्री रामेंद्र सरीन जी ने की थी। 
श्री रामेंद्र सरीन जी से मैं कभी नहीं मिला, लेकिन हरदोई के मेरे एक परिजन अशोक कुमार शुक्ला उनसे मिले थे। 
मुमकिन है कि अब तक आप भी श्री रामेंद्र सरीन जी के नाम से वाकिफ हो चुके हों, मुमकिन है कि आप अब तक उनके नाम से वाकिफ न भी हुए हों। मुझे उनके बारे में कल ही पता चल गया था, लेकिन मेरा मन कल उनके बारे में लिखने को बिल्कुल नहीं हुआ। मेरे मन में ऐसी ख़बरें अवसाद पैदा करती हैं और अवसाद से मैं बहुत बचना चाहता हूं। 
सरीन साहब की कहानी हमारी और आपकी कहानी से अलग नहीं। 
उन्होंने जीवन में वही किया, जो हम और आप कर रहे हैं। अब आपके मन में सवाल उठ रहा होगा कि संजय सिन्हा फिर पहेली बुझाने लगे हैं, तो मैं आपकी शंका का समाधान करते हुए सीधे-सीधे मुद्दे पर आ जाता हूं। 
कुछ साल पहले सरीन साहब बरेली में दूरदर्शन के बड़े अधिकारी हुआ करते थे। इतने बड़े अधिकारी कि दो-चार नौकर घर पर रख सकते थे और अपने बच्चे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा सकते थे। उन्होंने ये किया भी। हर महान बाप की तरह उन्होंने भी अपने बच्चे को शहरे के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ाया। इस बात की पूरी जानकारी रखी कि बेटा ‘ट्विंकल, ट्विंकल लिटिल स्टार’ वाली कविता को ठीक से रट पाया है या नहीं। उन्होंने इस बात का भी ध्यान रखा कि कहीं उनके बेटे की स्कूल की यूनिफार्म में सलवटें तो नहीं पड़ गईं। बड़े लोगों की शान होती हैं ऐसी बातें। 
उनका बेटा खूब पढ़ा। स्कूल से कॉलेज, कॉलेज से विदेश में नौकरी। किसी बाप के लिए इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। 
बाप का सपना पूरा हुआ। बेटे ने खूब पढ़ाई की। सरीन साहब ने बेटे को सब कुछ पढ़ाया, बस रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ा पाए। 
मुझे याद है, मैं तब जनसत्ता में नौकरी करता था। मेरे पिताजी मेरे छोटे भाई के पास बड़ौदा गए थे। एक शाम भाई ने फोन किया कि पिताजी की तबियत ख़राब है, भाई चले आओ। मैं उस दिन किसी वज़ह से बड़ौदा नहीं जा पाया था। मैं बड़ौदा नहीं गया, लेकिन मेरा मन बड़ौदा में पिताजी के पास जाकर अटक गया था। वो रात मैंने बिस्तर पर कैसे काटी थी, मैं ही जानता हूं। अगली सुबह मैं इंडियन एयरलाइंस का दफ्तर खुलने से पहले उसके काउंटर पर खड़ा था। काउंटर खुला, मैंने बड़ौदा का टिकट लिया, पर वापस लौटते हुए मुझे ऐसा लगने लगा था कि मैंने देर कर दी है। 
घर आया तो पता चला कि पिताजी का निधन हो गया है। 
मैं शाम तक बड़ौदा पहुंच भी गया था, लेकिन मैंने आज तक खुद को उस देर के लिए माफ नहीं किया है। 
जानते हैं क्यों?
क्योंकि मेरे पिता मेरी स्कूली पढ़ाई से अधिक रिश्तों के विद्यालय में मुझे पढ़ाने में यकीन करते थे। उन्होंने हम दोनों भाइयों को रिश्तों के विद्यालय में कुछ इस तरह पढ़ाया था कि एक ऐसा वक्त भी था कि हम दोनों भाई पिता से इस बात पर नाराज़गी जताया करते थे कि आप रिटायर होने के बाद उसके पास मुझसे अधिक रुकते हैं। हम दोनों भाइयों के लिए हमारे पिता संसार के सबसे महान पिता थे और हम दोनों के सबसे अच्छे मित्र भी। यहां तक कि हम दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों को यह निर्देश दे रखा था कि किसी और से तुम्हारे रिश्ते चाहे जैसे हों, तुम उनसे चाहे जैसे अपने रिश्ते निभाओ, लेकिन तुम दोनों के व्यवहार से हमारे पिता के मन को कभी रत्ती भर तकलीफ नहीं होनी चाहिए। 
हमारे पिता की दोनों बहुओं ने जब तक पिताजी रहे, उनका पूरा मान रखा। 
दरअसल रिश्तों को लेकर हम दोनों भाई बहुत स्पष्ट थे। हम दोनों रिश्तों के जिस स्कूल से पढ़ कर निकले थे, वहां कभी हमने तोतला नहीं बोला। हम दोनों की समझ एकदम साफ थी। 
हम दोनों की समझ साफ थी, क्योंकि हमारे पिता की समझ रिश्तों को लेकर बिल्कुल साफ थी। 
पर सरीन साहब कहीं चूक गए। 
उन्होंने अपने बच्चे को सब कुछ पढ़ा दिया, पर रिश्तों का अर्थ नहीं पढ़ा पाए। 
हर आदमी को एक दिन काम से रिटायर हो जाना पड़ता है। सरीन साहब भी रिटायर हो गए। इस बीच उनकी पत्नी का निधन हो चुका था। 
सरीन साहब जब रिटायर हुए, तब उनका बेटा विदेश में नौकरी पा चुका था। वो विदेश में सेटल हो चुका था। 
पिता ने अगर बेटे को नौकरी के पाठ के साथ-साथ रिश्तों का पाठ भी पढ़ाया होता तो बूढ़ा बाप अकेला न रहता। 
काश ऐसा होता! 
रिटायर्ड बाप किस काम का? बूढ़ा बाप किस काम का? 
विदेश की चमकीली ज़िंदगी में टूटे दांतों वाला बूढ़ा बाप बेटे के लिए डस्टबिन से अधिक कुछ नहीं रह गया था। और ये डस्टबिन? 
मुझे नहीं पता, लेकिन वो पिछले कई वर्षों से वृद्धाश्रम में पड़ा था। और कल अखबारों में खबर छपी की दूरदर्शन से रिटायर्ड डायरेक्टर श्री रामेंद्र सरीन का शव दारू के ठेके के बाहर लावारिस पड़ा मिला। 
इसके आगे लिखने को क्या बचा? इसके आगे पढ़ने को भी क्या बचा है? संजय सिन्हा की उंगलियों ने कल इसे लिखने से मना कर दिया था। आज भी इस कहानी को लिखते हुए उनकी उंगलियां कांप रही हैं। 
मेरी कहानी का मर्म आप ये बिल्कुल मत निकालिएगा कि मैं सरीन साहब की औलाद को कोस रहा हूं। मैं सरीन साहब को ही कोस रहा हूं क्योंकि सच्चाई यही है कि अपनी व्यस्त ज़िंदगी में हम खुद ही अपनी संतान को बाबा ब्लैक शिप वाला पाठ तो पढ़ाते हैं, लेकिन रिश्तों का पाठ नहीं पढ़ाते। जब हमने बच्चे को पढ़ाया ही नहीं कि रिश्तों का अर्थ क्या होता है, तो हमें बच्चे को कोसने का अधिकार भी नहीं। 
पहले अपनी सोच साफ करनी होती है, फिर किसी को कोसना होता है। आप भी अपने मन में झांकिए कि आपके पीछे कोई रोने वाला है या नहीं। 
जिनके पीछे रोने वाले नहीं होते, उनकी ज़िंदगी सरीन साहब जैसी ही गुजरती है। 
और इसके ज़िम्मेदार आप खुद होंगे, कोई और नहीं।

Sunday, January 22, 2017

सही का हीरो

डॉ. अव्यक्त अग्रवाल 
।।सही का हीरो।। #AapkeHeroes
12 साल का एक बच्चा ।मेडिकल ओपीडी विशेषज्ञ कक्ष में।
मेरी टेबल पर स्लिप रख कर बड़े आत्मविश्वास से बोला "सर मुझे देख लीजिये।"
मैंने लैपटॉप से नज़र हटा कर जूनियर डॉक्टर्स के कमरे की ओर इशारा कर कहा पहले वहाँ दिखा लो ।
उसने कहा "नहीं सर आप ही देखो।"
उसने मेरी बात नहीं मानी थी लेकिन उसका आत्मविश्वास मुझे अच्छा लगा।
मैंने मुस्कुरा कर कहा "बैठो।"
उसे बेल्स पाल्सी थी।
जिसमें चेहरे के एक ओर की मांसपेशी अचानक कमज़ोर हो जाती है।और तिरछापन आ जाता है।
वो चिंतित था इस अजीब समस्या से।
मुझसे कहा "मैँ ठीक तो हो जाऊंगा न सर।"
मैंने कहा" हाँ 1 महीने में पक्का।
तुम कन्हाँ के हो?"
"सर कटनी।"
कटनी तो जबलपुर से 100 कि मीटर दूर है।किसके साथ आये हो।"
उसने कहा "अकेले"
मुझे आश्चर्य हुआ छोटा बच्चा अकेले इलाज केे लिए। इतने दूर और आत्मविश्वास से ओपीडी स्लिप कटवा के मुझसे बात करते हुए।
कुछ देर बात करने पर उसने बताया कि उसके पिता की मृत्यु हो चुकी है।
वो एक कंप्यूटर कोचिंग संस्थान के लिए प्रचार करने और नए नए स्टूडेंट्स लाने का काम करता है।साथ ही उसके मालिक उसे कंप्यूटर भी सिखाते हैं।
मैंने पुछा "और स्कूल"???
उसने दम्भ के साथ कहा "वो भी जाता हूँ।"
"अच्छा क्या बनना चाहते हो"???
उसने कहा "अपने छोटे भाई के साथ मिल कर अपना कंप्यूटर सेंटर खोलूंगा।" उसने ये नहीं कहा था कि सेंटर खोलना चाहता हूँ।उसने कहा था सेंटर खोलूंगा।टपकता हुआ रचनात्मक आत्मविश्वास।
उसने बताया घर पर
उसकी माँ बीमार रहती है और एक छोटा भाई भी है जिनकी वो देखभाल करता है।इसलिए जल्दी ठीक होना है।
मैंने उससे कहा "क्या तुम मेरी एक क्लास समाप्त होने के बाद कुछ देर के लिए मेरे घर चल सकते हो।"
उसने हामी भर दी।
मैं अपने बच्चों को असल जिंदगी के एक हीरो से मिलाना चाहता था। वो अकेला उस भीड़ में जिंदगी से हंस कर संघर्ष कर रहा था।उसके सपने ना सिर्फ खुद के लिए बल्कि भाई के लिए भी थे।जिंदगी जिसे ठोकर मारती आयी थी वो जिंदगी को माफ़ कर आगे बढ़ रहा था।
क्या हम किसी चाय बेचने वाले के तभी गुणगान करें जब वो मुख्यमंत्री बन जाये।चाय बेचते समय क्या उसके संघर्ष को पहचाना जा सकता है।
असल जिंदगी में मुझे टीवी के ब्रांडेड हीरो से बड़े हीरो दिख जाते हैं।
एक विकलांग पिता अपनी 'तीन पहियो' की स्कूटर में अपने बच्चे के लिए 'दो पहियों' की साइकिल ले जाते दिखा।
एक माँ मेरे क्लिनिक पर आती है जिनके दोनों बच्चों को आटिज्म है।बहुत ऊधम करते हैं दोनों।लेकिन वो खुशी से उनकी देख रेख करती है।
क्लिनिक पर ही आने वाली एक पत्नी जिसने अपने उस पति को किडनी दीं जिसने बीमार होने के पहले उसे डिवोर्स दे दिया था।
जीवन से जो लोग रचनात्मक संघर्ष करते हैं स्वयं के लिए अपनों के लिए और दूसरों के लिए उन सभी unsung heroes को मेरा नमन।
।।अव्यक्त।।

Saturday, January 21, 2017

डिप्रेशन: एक विस्तृत जानकारी।

अव्यक्त अग्रवाल



जब से मैंने फेसबुक पर लिखना शुरू किया,बहुत से लोग डिप्रेशन ,या निराशा से उबरने के उपाय इनबॉक्स में पूछते हैं।
साथ ही शिशुरोग विशेषज्ञ एवं एलर्जी विशेषज्ञ होने के बावज़ूद क्लीनिक पर भी इस तरह की सलाह के लिए परिवार आते हैं।
तो सोचा डिप्रेशन या अवसाद पर एक विस्तृत जानकारी आपको दूं।
डिप्रेशन इस समय (ischemic heart disease)
के बाद दूसरी सबसे ज़्यादा होने वाली बीमारी बन गयी है।
शहरी क्षेत्रों में लगभग 15 प्रतिशत लोगों को एक वर्ष में डिप्रेशन का एपिसोड हो चुका होता है।
महिलाओं में डिप्रेशन पुरुषों की तुलना में ज़्यादा होता है।
प्रत्युषा सुसाइड के पहले गंभीर डिप्रेशन में रहीं होंगी।
आये दिन आप बेहद सफल लोगों के सुसाइड या डिप्रेशन की खबर सुन अवाक् रह जाते हैं।
फिर वो लोग जो अभी डिप्रेस नहीं हैं उन्हें जज करते हैं और कहते हैं,कायर थी,पलायनवादी थी,मूर्ख थी।लाइफस्टाइल ख़राब थी।बहुत महत्वकांक्षी थी।बिगड़ी हुई थी।फ्लॉप हो रही थी।लिव इन में रहने वालों का तो यही होना है।
आप बेहद हंसमुंख हैं,मिलनसार हैं,बातूनी हैं।तो क्या आप कभी इसके शिकार नहीं हो सकते?
गलत धारणा है।जिस तरह मलेरिया या डेंगू हमें हो सकता है,उसी तरह डिप्रेशन भी किसी को भी कभी भी हो सकता है।कोई भी इम्यून नहीं।
आखिर आज आप जब खुश हैं तो कुछ प्राकृतिक रसायन डोपामिन और सेरोटोनिन के सही अनुपात की वजह से हैं।
इस अनुपात में nanogram का परिवर्तन आपके व्यक्तित्व,नज़रिये और विचार शक्ति को पूरी तरह बदल सकता है।
क्या कभी आप ऐसे किसी केमिकल को कण्ट्रोल करने की कोशिश करते हैं।नहीं न।ये प्रकृति और आपके जीन्स करते हैं आपके लिए।और कभी कभी जेनेटिक कोडिंग में गलती इन जादुई रसायनों का अनुपात बिगाड़ देती है।इस डिप्रेशन को endogenous डिप्रेशन कहते हैं।4 वर्ष के छोटे बच्चे को भी हो सकता है।
बुजुर्गों में डिप्रेशन बेहद कॉमन है,लगभग 70 प्रतिशत तक को हो सकता है।
Endogenous डिप्रेशन में सिर्फ सलाह काम नहीं करती।
जागरूकता के अभाव में उन्हें लोग ऐसा कहते मिल जायेंगे "यार तुम खुश क्यों नहीं रहते।"
"इतने निराशावादी क्यों हो।"
"खुश रह कर देखो।देखो हम कैसे खुश हैं।"
"यार दुनिया बड़ी सुन्दर है।नज़र होनी चाहिए।"
"चल दो पैग पीते हैं।सब ठीक हो जायेगा।"
"मैडिटेशन किया कर।"
लेकिन endogenous डिप्रेशन में सलाह तब तक काम नहीं करेगी जब तक उस रासायनिक अनुपात को न ठीक किया जाये।दवाओं से।
उपरोक्त सलाह उसी तरह की हैं कि किसी अंधे को कहा जाये कि भाई देख के तो देख।दिखता है।कोशिश करने से दिखता है।देख हमें दिखता है,आसान है तुझे भी दिखेगा।देख के तो देख।
परिस्थिति जन्य डिप्रेशन हम सबको ही हो सकता है है,मुश्किल हालातों में।और इस तरह के डिप्रेशन से छुटकारा निम्न उपायों से संभव है।
1.समस्या के मूल को समझना।यदि समस्या का हल है तो उसका सामना करना और कोशिश में जुटना हल करने की।
2.मूल समस्या का यदि हल नहीं तो दिमाग को तैयार करना उस समस्या को स्वीकार और आत्मसात करने को।हाँ ये संभव है।
3.excercise....खेल कूद
एक बेहद strong antidepressant है।
जिम ज्वाइन करना,योगा क्लास,एरोबिक्स ये सब endorphins का स्त्राव कराते हैं ब्लड में जो कि सुकून और खुशी का अहसास कराने वाला रसायन है।
साथ ही इंडोर्फिन्स मानसिक एवं शारीरिक दर्द से भी लड़ते हैं।
4.अच्छी किताबें,
भी मन की एक अच्छी खुराक है।अच्छी किताबें जादुई असर करती हैं।शब्द आपके मस्तिष्क की कोशिकाओं में एक अद्भुत अनुभव के रूप में समाहित हो सकते हैं।
5.दर्शन,philosophy
जब पता होता है कि आप इस ब्रह्माण्ड की एक छोटे से छोटे बिंदु से भी छोटी इकाई हैं । तो खुद को और अपने जीवन की घटनाओं को थोड़ा हल्के से लेते हैं।विजय सिंह ठकुराय की पोस्ट पढ़ना ब्रह्माण्ड पर, हमारे दम्भ और निराशा दोनों को दूर करेंगी ये पोस्ट।
सच तो ये है कि हम मनुष्य कुछ जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं से ज़्यादा कुछ भी नहीं।
हमारा तो खुद अपने शरीर पर ही कण्ट्रोल 1 प्रतिशत से भी कम है।
आपकी ह्रदय गति 70 से 90 के बीच होगी अभी ये पढ़ते हुए।पल्स देखिये।150 नहीं न।तो क्या ये ह्रदय गति भी आपने कोशिशों से सेट की है?
बहुत कुछ ऐसा है जो प्रकृति आपके लिए बिना कहे कर रही है।
कभी कुछ कोशिशें नाकाम हुईं तो क्या।
5. अच्छी नींद लेना।
फेसबुक,व्हाट्सप्प या आपका काम नींद के आड़े न आये।
नींद के समय प्रकृति आपके दिमाग के इंजन को बंद कर रिपेयरिंग करती है।तो उसे मौका दीजिये रोज़ सर्विसिंग और रिपेयरिंग का।
6.रिश्ते
रिश्तेदार,दोस्त,जानवर,पौधे आपके साथ आपके युग में जीते हुए आपको सुरक्षा और खुशी का अहसास कराते हैं।इनके प्रति अच्छी और प्रेम भरी भावनाएं रखिये।वो भी आप से वैसी ही सुरक्षा चाहते हैं क्योंकि वो भी डिप्रेस हो सकते हैं।
Never be judgmental towards a depressed person...
Be supportive..
As you are equally prone to have it..
आपका

अव्यक्त

Friday, January 20, 2017

यात्रा वृतांत

मॉरिशस, अफ्रीका का सबसे समृद्ध देश। एक ऐसा देश जिसके विषय में हर भारतीय को पता होना चाहिए। क्यों? आपको इस यात्रा वृतांत को पढ़ने के बाद पता चल जायेगा।
वहां जाने के पहले मुझे कुछ कुछ तो पता था ही आप सब की तरह। लेकिन करीब से जानने में नयी बातें पता चलीं।
हम मुम्बई से मॉरिशस 6 घंटे की हवाई यात्रा के बाद जिस एक मात्र इंटरनेशनल एअरपोर्ट पंहुचे थे उसका नाम है, 'सर सीवूसागुर रामगूलम इंटरनेशनल एअरपोर्ट।'
सर रामगूलम भारत से वहां जा बसे बेहद लोकप्रिय चिकित्सक थे । गरीबों के मसीहा। और जब 1968 में मॉरिशस आज़ाद हुआ तब रामगूलम की लोकप्रियता ने उन्हें वहां का पहला प्रधानमंत्री बनवाया।
एअरपोर्ट के एग्जिट गेट से निकलते ही, तीन मनी एक्सचेंज काउंटर से हम सभी को आवाज़ें दी जाने लगीं। जिनमें से सबसे ज़्यादा लोग उन तीन लड़कियों के काउंटर से ही मनी एक्सचेंज कर रहे थे।
लड़कियां जीन्स, और टी शर्ट पहने हुए, भारतीय नाक नक्श की लग रही थीं। और वे जो कह रही थीं,कुर्सी पर खड़े हो कर हिंदी में, वह था....
" भाई साहब यहाँ आइये, मनी एक्सचेंज करवाईये।"
हम से पहले पंहुचे लड़कों ने उन्हें कुछ कहा था तो उन्होंने हिंदी में ही कहा, हम आपको राखी भिजवाएंगे आप मिठाई ले कर आना।
लड़कों के चेहरे साफ़ बुझते से दिखे थे।
मनी एक्सचेंज के समय मैंने पूछा आप इतनी अच्छी हिंदी कैसे बोलते हैं।
" लड़कियों ने कहा, हमारे पूर्वज बिहार से थे। हम मौरिशन हिन्दू हैं।"
एअरपोर्ट से बाहर हमें जो ट्रेवल एजेंसी का गाइड मिला उसका नाम अमर था। वह भी बिल्कुल हमारी सी हिंदी ही बोलता हुआ।
मेरे सवाल कि आपने हिंदी कैसे सीखी उसने भी वही ज़वाब दिया।
"हमारे पूर्वज बिहार से थे। दादा के भी दादा यहाँ आये थे।"
कार में बैठने पर जो ड्राईवर 'केविन' मिला वह अफ्रीकन,मौरिशियन् मूल का लग रहा था। उसे हिंदी नहीं आती थी, लेकिन लगभग एक घंटे दूर स्थित होटल तक पंहुचते वह वहां के ऍफ़ एम् में सिर्फ और सिर्फ हिंदी गाने सुनते और सुनाते गया। उसने बताया उसे बॉलीवुड गाने अच्छे लगते हैं। ऍफ़ एम् में रेडियो जॉकी वहां की लोकल भाषा क्रेओल में बोलती लेकिन गाने हमारे सुनाती।
केविन ने बताया भारत की ही तरह यहाँ भी भारतीय फिल्में शुक्रवार को रिलीज़ हो जाती हैं। यहाँ की अपनी फिल्म इंडस्ट्री नहीं है। हाँ टीवी सीरियल बनते हैं,क्रेओल में।
रास्ते खूबसूरत थे, रोड पूरे रास्ते बिना किसी टोल के भारत के सर्वश्रेष्ठ रास्तों सी थी।
आजू बाज़ू गन्ने के बड़े बड़े खेत और सामने ऊंचे पहाड़, tall dark handsome पहाड़, लेकिन अकेले..... इन हैंडसम पहाड़ों पर प्यार बरसाने उतर आयी घनी सफ़ेद बदलियां, पहाड़ों को चूमते हुए।
मौसम सुहाना,न गर्म न ठंडा। हल्की धूप।
होटल पंहुच, होटल का बीच मिलते ही सभी बच्चे ख़ुशी से उछलने लगे थे।
नीला, साफ़, पारदर्शी समुद्र। लेकिन काफी शांत। Mauritius से शांत रहना सीखा था हिन्द महासागर ने कि हिन्द महासागर से मॉरिशस ने। पता नहीं।
विशाल नीला समुद्र, इर्द गिर्द सुदूर दिखते पहाड़। आसमान और समुद्र का एक ही रंग। क्या पता यह समुद्र आसमान और उसमें बैठे ईश्वर का कोई आइना हो।
शांत,हल्की ठंडी हवा, और लहरों के टकराने और जाने की आवाज़ें। कुछ गौरैयों, कोयल और सुन्दर चिड़ियों की चीं,चीं। सबकुछ स्लो मोशन में गुज़रता सा, प्रकृति ने शायद हिप्नोसिस की क्लास लगाई थी।
गौरैया इंसान से इतनी हिली मिली कि मेरे हाथ से खाना ले जाती।
होटल के 80 प्रतिशत स्टाफ हिंदी बोल लेते थे। ज़बकि भारत कभी नहीं गए थे।
हमने वहां लोकल बस में भी ट्रेवल किया और टूरिस्ट बस में भी।
टूरिस्ट बस में एक नियम बेहद सख्ती से मनवाया जाता है वो है कि बस की खिड़कियां जो कि बड़ी बड़ी और कांच की होती हैं, हमेशा बंद रहना चाहिए, साथ ही बस के भीतर कुछ भी खाना, सिगरेट, शराब पीना सख्त मना है। छोटे छोटे कस्बों और गांवों में तक ज़गह,ज़गह कैमरे लगे हैं। पुलिस तो मुझे कहीं दिखाई ही नहीं दीं लेकिन ड्राईवर और गाइड का कहना था कि इन कैमरों से नज़र रखी जाती है। खिड़की इसलिए नहीं खोलना कि कोई कहीं कुछ न फेंके।
बसों में पंक्ति लिखी होती ..cleanliness is the godliness....
गाइड रेहान और ड्राईवर विक्रम, दोनों ने ही यह कहा कि नियम अपनी ज़गह है लेकिन कोई भी मौरिशियन यहाँ गन्दगी नहीं कर सकता। क्योंकि टूरिस्म, हम सबकी रोज़ी रोटी है। यहाँ गन्दा होगा तो आप क्यों आओगे।
ड्राईवर रेहान ने बताया कि वो एक मौरिशियन् मुस्लिम है। और जब भारतीय उसके साथ घूमते हैं उसे उर्दू में बात करना बहुत अच्छा लगता है। हालाँकि उसकी उर्दू विक्रम की हिंदी से अलग नहीं लगी थी।
उसने बताया कि यहाँ के लोगों को स्कूल में क्रेओल,इंग्लिश और फ्रेंच सीखना ज़रूरी है। फ्रेंच और ब्रिटिश दोनों ने यहाँ लंबे समय तक राज़ किया था। फ्रेंच को हरा ब्रिटिश ने यह आइलैंड छीना था और सौ से ज़्यादा वर्ष तक राज़ किया।
क्रेओल फ्रेंच से काफी मिलती जुलती भाषा है। जिसमें अफ्रीकन शब्द भी हैं।
अफ्रीका, और भारत से लाये गए मज़दूरों के लिए ब्रिटिश ने यह नयी भाषा बनाई थी।
लेकिन सबसे प्रमुख बात यह कि सभी हिन्दू को हिंदी और मुस्लिम्स को उर्दू सीखना ज़रूरी है वरना माता पिता को जुर्माना देना होगा।
मतलब यह कि मॉरिशस सरकार अपनी सांस्कृतिक धार्मिक पहचान को संरक्षित रखने लोगों को प्रेरित करती है।
हाँ मज़ेदार बात, छोटे बड़े लगभग 50 प्रतिशत मकानों में मुझे आँगन में छोटे से मंदिर बने दिखे। और लगभग हर एक किलोमीटर पर कॉलोनी में बना एक मन्दिर।
सभी शादी शुदा हिन्दू महिलाएं छोटी सी मांग भरे दिखीं एक बिंदी के साथ। इनमें मॉल में काम करती नयी शादी शुदा, 5 स्टार होटल की रिसेप्शनिस्ट से लेकर एयरहोस्टेस तक शामिल हैं।
गाइड विक्रम ने बताया कि यहाँ 55 प्रतिशत हिन्दू, 25 प्रतिशत मुस्लिम्स और बाक़ी अन्य धर्म हैं।
200
वर्ष से ज़्यादा डच,फ्रेंच और ब्रिटिश सत्ता के बावज़ूद क्रिस्टियन वहां कम हैं। ब्रिटिश ने भी उनकी सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान कभी बदलने की कोशिश नहीं की। इसलिए ब्रिटिश के प्रति उनके मन में कड़वाहट नहीं है।
भारतीय, अफ्रीकी, फ्रेंच मूल के लोग ज़्यादा हैं।
हिंदुओं में ज़ाति जैसी कोई प्रथा ही नहीं है। कोई ज़ाति नहीं मानी जाती। दहेज़ का कोई कांसेप्ट ही नहीं है। 
ज़्यादातर शादियां प्रेम विवाह होती हैं।
हिन्दू,और मुस्लिम्स में 1968में स्वतंत्रता के समय एक मात्र दंगा हुआ था जिसमें 300 लोग मारे गए थे। इसके बाद से कभी कोई लड़ाई नहीं हुई।
हाँ उनकी शादियां आपस में नहीं होतीं। कोई लड़का या लड़की आपस में शादी करना चाहे तो माता पिता की ओर से अहिंसक विरोध होता है। बालिग लोगों का सरकार साथ देती है।
मुस्लिम्स के लिए बड़ी और बहुत अच्छी मस्ज़िद है, पोर्ट लुइस में। वहीं कुछ मदरसे भी। रेहान ने बताया कि हमारे यहाँ बुर्का नहीं के बराबर है।
मेरी बात वहां के प्लास्टिक सर्जन और पूर्व डायरेक्टर जर्नल हेल्थ से भी काफी देर हुई। उन्होंने कोलकाता से mbbs किया था कभी। वे अस्थमा एवं एलर्जी पर मेरे लेक्चर के चेयरपर्सन थे। उन्होंने कहा हम खुद को सेक्युलर नहीं प्लूरल कहते हैं। मतलब कई तरह की धार्मिक,सांस्कृतिक मान्यताओं वाला देश।
एक एक्वेरियम में अलग अलग तरह की मछलियाँ और कछुए जैसे बिना एक दूसरे को नुकसान पंहुचाये तैरते रहते हैं अपने अपने रंग बिखेरते। मॉरिशस कुछ वैसा ही खूबसूरत विशाल एक्वेरियम सा लगा। ईश्वर के ड्रॉइंग रूम में सजा एक्वेरियम।
मॉरिशस में विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिव प्रतिमा और 13 वें ज़्योतिर्लिंग हमने देखे। इस मंदिर ले जाते समय ड्राईवर रेहान ने हिंदी की कहावत कुछ यूँ कही.....पहले सिर्फ पूजा फिर काम दूजा।
सबसे बड़ी पहली प्रतिमा गुड़गांव और दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा काठमांडू में है यह हमें गाइड विक्रम ने बताया। बस में किसी भी भारतीय को नहीं पता था कि भारत में सबसे बड़ी शिव प्रतिमा है,और है तो कहाँ है।
रोड के सामानांतर उतनी ही बड़ी दुर्गा माँ की प्रतिमा बनते दिखी। यह प्रतिमाएं बिरला समूह ने दान की हैं।
गंगा तलाव मंदिर में 13 वें ज़्योतिर्लिंग हैं। मंदिर बेहद शांत, साफ़ सुथरे हैं। हिन्दू पुजारी साफ़ मंत्रोचारण करते हुए। मंदिर के बाहर बेहद सुव्यस्थित मेडिकल पोस्ट बनी थीं जो कि शिव रात्रि के समय जब हज़ारों लोग आते हैं दर्शन और पूजा के लिए तब सुचारू उपचार के काम आती हैं।
मुझे वहां रास्तों में कुछ भारतीय धर्मगुरुओं के पोस्टर दिखे, व व्याख्यान के। लेकिन पूरे मॉरिशस में कहीं भी किसी राजनीतिज्ञ के पोस्टर या होर्डिंग नहीं दिखे।
ज़गह ज़गह मिलने वाले स्ट्रीट फ़ूड में समोसा, दाल पूड़ी बेहद लोकप्रिय है।
गरीबी,बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार, अपराध वहां नहीं के बराबर है।
पोर्ट लुइस के घने ट्रैफिक में भी हार्न की एक भी आवाज़ सुनायी नहीं दी कहीं।
कम से कम 15000 रूपये हर व्यक्ति कमाता है।
सबका अपना घर है। जिनका नहीं है उन्हें सरकार देती है। किराये से रहने का सिस्टम ही नहीं है।
बच्चों की सम्पूर्ण पढ़ाई, किसी भी बस का ट्रेवल 18 वर्ष की उम्र तक मुफ़्त है। प्राइवेट स्कूल सिर्फ 2 हैं।
24 घंटे एम्बुलेंस और चिकत्सा हर नागरिक को मुफ़्त है।
वहां नेवी नहीं, आर्मी न के बराबर मात्र सिंबल के रूप में है। ट्रेन एक भी नहीं।
उनके पड़ोसियों मेडागास्कर और साउथ अफ्रीका से उन्हें कोई खतरा नहीं।
हवाई सफ़र से 2 घंटे दूर स्थित एक आइलैंड पर अमेरिकन आर्मी ने एक बेस बनाया हुआ है।
लोग सुबह से शाम काम करने, कमाने और परिवार के साथ मस्त रहने वाले हैं।
खुशहाल जीवन की वज़ह से ज़्यादातर खुशमिजाज़,मज़ाकिया और मदद करने वाले मिले।
हिन्दू,मुस्लिम सभी का अभिवादन का तरीका गाल से गाल मिलाना है। और पुरुष,महिलाएं सभी आपस में इसी तरह अभिवादन करते हैं। लेकिन हमसे नमस्ते ही कहते।
अभी के प्रधानमंत्री #अनिरुद्ध #जगन्नाथ के घर के सामने से हमारी बस निकली। एक भी पुलिस कर्मी गेट पर नहीं। घर भी बहुत बड़ा नहीं।
गाइड ने बताया कि क्योंकि कोई सुरक्षा खतरा नहीं इसलिए मात्र चार पुलिस कर्मी साथ रहते हैं वे जब कहीं भी जाते हैं।
वाटर स्पोर्ट पसंद करने वालों के लिए विश्व की सारी गतिविधिधियां यहाँ उपलभ्द हैं।
Underwater scooter का मज़ा मैंने बच्चों के संग लिया। ट्रेवल एजेंट ने बताया विश्व में सिर्फ मॉरिशस में ही पानी के 8 मीटर नीचे चलने वाली यह स्कूटर उपलब्ध् है।
कुल मिलाकर मॉरिशस एक छोटा सा बेहद सुन्दर द्ववीप् भारतीयों और ब्रिटिश द्वारा बनाया गया। 
लेकिन सही मायनों में अनेकता में एकता, साफ़ सफाई, ईमानदारी, आर्थिक समानता के पाठ हमें सिखा जाता है।
वहां के चुनावी मुद्दे सिर्फ और सिर्फ विकास, रोज़गार, घर जैसे हैं। समाज जातियों में नहीं बंटा। धार्मिक मान्यताएं,सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं और सहेजी गयी हैं, इनका उपयोग राजनीतिक और आधिपत्य के लिए करना अब तक वे नहीं सीख पाये हैं।
मॉरिशस का खाना कई मायनों में बिल्कुल हम सा है।मसाले वही सब। गली से लेकर 5 स्टार तक समोसा पसंदीदा स्नैक्स है। नारियल के लड्डू,बर्फी,बूंदी के लड्डू, गुझिया जैसी मिठाइयां आम मिठाई दुकानों पर मिल जाएंगी। हाँ वहाँ हमारे जैसे नमकीन नहीं खाये जाते।
हर चीज़, हमसे लगभग 2 से 4 गुना महंगी है,भारतीय रुपयों में,एक को छोड़ कर। और वो है, ज़मीन। जितने भारतीय रुपयों में हम भारतीय फ्लैट या डुप्लेक्स लेते हैं वहां समुद्र के पास बड़ा बंगला ले सकते हैं। लेकिन अमीर गरीब का फर्क वहां कम होने से हमें न तो झोपड़ी दिखीं, न ही बड़े आलीशान बंगले। घरों की बनावट बहुत हद तक हम जैसी ही है, छतों पर रस्सियों में सूखते वैसे ही कपड़े। लेकिन एक भी कॉलोनी में कचरा या गन्दगी नहीं दिखी।
मॉरिशस की कुल आबादी हमारे छोटे शहर जबलपुर से भी कम है। 12 लाख लगभग। लेकिन राजधानी पोर्ट लुइस दुनिया के सबसे ज़्यादा जनसंख्या घनत्व वाले शहरों में से एक है। पोर्ट लुइस सुव्यस्थित शहर है। 
तीन अलग अलग भागों में बंटा हुआ। पहाड़ के एक ओर रिहायशी इलाका, एक ओर व्यावसायिक और एक ओर पोर्ट है।
मॉरिशस का ज़मीनी भाग, 97 km लंबाई और 77 km चौड़ाई में ख़त्म हो जाता है। कुल 5 शहर हैं, कुछ कसबे और गाँव हैं। कोई राज्य ही नहीं है। 
बिजली,साफ पानी 24 घंटे हर क्षेत्र में है।
एक ही चीज़ अखरी। वह यह कि सब कुछ शाम 6 बजे बंद हो जाता है। हालांकि ग्रांड बे नाम के छोटे लेकिन बेहद विकसित कसबे में नाईट क्लब और पब खुले होते हैं।
शाम होते हम होटल लौट आये थे। रविवार को पूरा मॉरिशस बंद होता है। सब परिवार के साथ घूमते हैं। 
गाइड विक्रम भी खुश था कल की छुट्टी को।
मैंने पूछा मॉरिशस की समस्याएं क्या हैं?
उसने हंस कर कहा "यहाँ लड़कियां कम हैं।
मेरे ज़िंदगी में एक ज्वालामुखी की ज़रूरत है। अकेला हूँ।"
मैं हंसा। ज्वालामुखी???
'वो बोला हाँ सर मुझे गाइडिंग करते करते इतना मालूम हो गया है कि ये सब ज्वालामुखी ही होती हैं।'
मेरा मन किया कहूँ कि भाई गाइड तो मैं भी था, मुझे यह अक्ल समय पर क्यों न आयी। लेकिन वो पास ही थी....क्रेटर। तो बोल न सका।
और फिर वो हमारे कुमार सानू का गाना ''सांसों की ज़रूरत हो जैसे ......बस एक सनम चाहिए,आशिकी के लिए" गाते हुए उतर गया।
मैं फिर समुद्र में डूबते नारंगी सूरज को देखते सोच रहा था......
मार्क ट्वेन ने यूँ ही नहीं कहा होगा कि,
'आखिर आप जान ही जाते हो कि भगवान् ने पहले मॉरिशस बनाया फिर उसकी नक़ल कर स्वर्ग बनाया।'
आपका
अव्यक्त